स्वामी विवेकानंद के पत्र – भगिनी निवेदिता को लिखित (20 जून, 1897)

(स्वामी विवेकानंद का भगिनी निवेदिता को लिखा गया पत्र)

अल्मोड़ा,
२० जून, १८९७

प्रिय कुमारी नोबल,

मैं निष्कपट भाव से तुम्हें यह लिख रहा हूँ। तुम्हारी प्रत्येक बात मेरे समीप मूल्यवान है तथा तुम्हारा प्रत्येक पत्र मेरे लिए अत्यन्त आकांक्षा की वस्तु है। जब इच्छा तथा सुविधा हो मुझे निःसंकोच लिखना; यह सोचकर कि मैं तुम्हारी एक भी बात को गलत न समझूँगा तथा किसी भी बात की उपेक्षा न करूँगा। बहुत दिनों से मुझे कार्य का कोई विवरण नहीं मिला है। क्या तुम कोई समाचार भेज सकती हो? भारत में मुझको लेकर कितना भी उत्साह क्यों न दिखाया जाय, मुझे यहाँ से किसी प्रकार की सहायता की आशा नहीं हैं, क्योंकि भारत के लोग अत्यन्त गरीब हैं।

फिर भी मैंने जैसी शिक्षा पायी थी, ठीक वैसे ही पेड़ों के नीचे, किसी प्रकार से खाने-पीने की व्यवस्था कर कार्य प्रारम्भ कर दिया है। काम की योजना भी थोड़ी बदली है। मैंने अपने कुछ बालकों को दुर्भिक्षपीड़ित स्थलों पर भेजा है। इससे जादू-मन्त्र जैसा असर हुआ है। मैं यह देख रहा हूँ, जैसी कि मेरी चिरकाल से धारणा रही है कि हृदय, केवल हृदय के द्वारा ही संसार के मर्म को छुआ जा सकता है। अतः इस समय अधिक संख्या में युवकों को प्रशिक्षित करने की योजना है, (अभी उच्च श्रेणी से लेकर ही कार्यारम्भ करने का विचार है; निम्न श्रेणी को लेकर नहीं, क्योंकि उनके लिए हमें अभी कुछ दिन प्रतीक्षा करनी पड़ेगी) और उनमें से कुछ को किसी एक जिले में भेजकर अपना पहला आक्रमण शुरू करना है। धर्म के इन मार्ग-प्रशस्तकों द्वारा जब मार्ग साफ हो जायगा तब तत्त्व एवं दर्शन के प्रचार का समय आएगा।

कुछ लड़कों को इस समय शिक्षा दी जा रही है; किन्तु कार्य चालू करने के लिए जो जीर्ण आवास हमें प्राप्त हुआ था, गत भूकम्प में वह एकदम नष्ट हो चुका है, गनीमत सिर्फ इतनी थी कि वह किराये का था। खैर, चिन्ता की कोई बात नहीं। मुसीबत और आवास के अभाव में भी काम चालू रखना है।… अब तक मुण्डित मस्तक, छिन्नवस्त्र तथा अनिश्चित आहार मात्र ही हमारा सहारा रहा है। किन्तु इस परिस्थिति में परिवर्तन आवश्यक है और इसमें सन्देह नहीं कि परिवर्तन अवश्य होगा, क्योंकि हम लोगों ने पूर्ण आन्तरिकता के साथ इस कार्य में योग दिया है।

यह सच है कि इस देश के लोगों के पास त्याग करने लायक कोई वस्तु नहीं है। फिर भी त्याग हमारे खून में विद्यमान है। जिन लड़कों को शिक्षा दी जा रही है, उनमें से एक किसी जिले का एक्जिक्यूटिव इंजीनियर था। भारत में यह पद एक उच्च स्थान रखता है। उसने उसे तिनके की तरह त्याग दिया!… मेरा असीम प्यार,

भवदीय,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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