स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी अखण्डानन्द को लिखित (13 नवम्बर, 1895)

(स्वामी विवेकानंद का स्वामी अखण्डानन्द को लिखा गया पत्र)

लन्दन,
१३ नवम्बर, १८९५

प्रिय अखंडानन्द,

तुम्हारा पत्र पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। तुम जो कार्य कर रहे हो, वह बहुत अच्छाहै। रा – बड़े उदार और मुक्तहस्त हैं, परन्तु इसलिए उनसे इसका नाजायज फायदा न उठाना चाहिए। श्रीमान् – का अर्थ-संग्रह करने का संकल्प अच्छा है; पर,मेरे भैया, यह संसार बड़ा ही विचित्र हैं, काम-कांचन से जहाँ पिंड छुड़ाना ब्रह्माविष्णु तक के लिए दुष्कर है। जहाँ रुपये-पैसे का सम्बन्ध है, वहीं भ्रम होने की सम्भावना है। अतः मठ के नाम पर अर्थ-संग्रह आदि का काम कोई न करे।… मेरे या हम लोगों के नाम से कोई गृहस्थ मठ के लिए या किसी दूसरी बाबत चन्दा वसूल कर रहा है, यह सुनते ही उस पर सन्देह करना और उसका साथ न देना। विशेषकर साधनहीन गृहस्थ अपना अभाव दूर करने के लिए तरह तरह के उपाय किया करते हैं। अतः यदि कोई कोई विश्वासी भक्त अथवा सहृदय गृहस्थ, जो साधनसम्पन्न है, मठ आदि बनाने के लिए उद्योग करे या संगृहीत अर्थ कोई धनी और विश्वासी गृहस्थ के पास हो, तो अच्छी बात, नहीं तो उससे अलग रहना। इसके विपरीत यह कि औरों को इस कार्य से मना करना। तुम अभी बालक हो, कांचन की माया नहीं समझते। मौका मिलने पर अत्यन्त नीतिपरायण मनुष्य भी प्रतारक बन जाता है। यही संसार है। चार आदमी के साथ मिलकर कोई काम करना हम लोगों की आदत नहीं। हमारी इसीलिए इतनी दुर्दशा हो रही है। जो आज्ञा-पालन करना जानते हैं, वे ही आज्ञा देना भी जानते हैं। पहले आदेश-पालन करना सीखो। इन सब पाश्चात्य राष्ट्रों में स्वाधीनता का भाव जैसा प्रबल है, आदेश-पालन करने का भाव भी वैसा ही प्रबल है। हम सभी अपने आपको बड़ा समझते हैं, इससे कोई काम नहीं बनता। महान् उद्यम, महान् साहस, महावीर्य और सबसे पहले आज्ञा-पालन – ये सब गुण व्यक्तिगत या जातिगत उन्नति के लिए एकमात्र उपाय हैं। और ये गुण बिल्कुल ही हममें नहीं हैं।

तुम जिस तरह काम कर रहे हो वैसे ही करते जाओ। परन्तु अपने विद्याभ्यास पर विशेष दृष्टि रखना। य – बाबू ने एक हिन्दी पत्रिका मुझे भेजी है उसमें अलवर के पण्डित रा – ने मेरी शिकागो-वक्तृता का अनुवाद किया है। दोनों सज्जनों को मेरी विशेष कृतज्ञता और धन्यवाद अर्पित करना।

अब तुम्हारे लिए कुछ लिखता हूँ। राजपूताना में एक केन्द्र खोलने का विशेष प्रयत्न करना। जयपुर या अजमेर जैसे किसी केन्द्रीय स्थान में वह होना चाहिए। इसके बाद अलवर, खेतड़ी आदि शहरों में उसकी शाखाएँ स्थापित करना। सबके साथ मिलना, हमें किसीसे विरोध की आवश्यकता नहीं है। पण्डित ना – जी को मेरा प्रेमालिंगन बता देना, वे बड़े उद्यमी है, समय आने पर बहुत ही व्यावहारिक सिद्ध होंगे। मा – साहब और – जी से भी मेरा यथोचित आदर कहना। क्या धर्म-समाज नाम की या इसी प्रकार की एक संस्था अजमेर में स्थापित हुई है? इसके विषय में मेरे पास लिखना। म – बाबू लिखते हैं कि उन्होंने एवं दूसरे लोगों ने मेरे पास पत्र लिखे, पर वे मुझे अभी तक नही मिले।…मठ, केन्द्र या इस प्रकार की किसी संस्था को कलकत्ते में स्थापित करना व्यर्थ है। वाराणसी ही ऐसे कार्यों के लिए उपयुक्त स्थान है। ऐसी मेरी बहुत सी योजनाएँ हैं; परन्तु ये सब चीजें धन पर निर्भर करती हैं। धीरे धीरे तुम्हें सब मालूम हो जायगा। तुमने समाचारपत्रों में देखा होगा कि इंग्लैण्ड में हमारे आन्दोलन की नींव जम रही है। यहाँ सभी काम धीरे धीरे होते हैं। परन्तु जॉन बुल एक बार जिस काम में हाथ ड़ालता है, उसे फिर छोड़ता नहीं। अमेरिकावासी बहुत फ़ुर्तीले हैं सही, पर प्रायः आग पर पड़ी फूस की तरह होते हैं, जो जल्द ही ठंडे पड़ जाते हैं। रामकृष्ण परमहंस अवतार हैं, इत्यादि मत सर्वसाधारण में प्रचारित न करना। अलवर में मेरे कई चेले हैं, उनकी ख़बर रखना।… महाशक्ति का तुममें संचार होगा – कदापि भयभीत मत होना। पवित्र होओ, विश्वासी होओ, और आज्ञापालक होओ।

बाल-विवाह के विरूद्ध शिक्षा देना। बाल-विवाह का समर्थन किसी भी शास्त्र में नहीं है। पर छोटी-छोटी लड़कियों के ब्याह के विरूद्ध अभी कुछ मत कहना। लड़कों का ब्याह रोक दोगे, तो लड़कियों का ब्याह भी अपने आप रूक जायगा। लड़की तो फिर लड़की से ब्याही नही जायगी। लाहौर आर्य समाज के मंत्री को लिखना कि अच्युतानन्द नाम के जो संन्यासी उनके साथ रहते थे, वे अब कहाँ हैं? उनकी विशेष खोज करना।… डर क्या?

प्रेमपूर्वक तुम्हारा,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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