स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी रामकृष्णानन्द को लिखित (3 जून, 1901)

(स्वामी विवेकानंद का स्वामी रामकृष्णानन्द को लिखा गया पत्र)

मठ, बेलूड़, हावड़ा,
३ जून, १९०१

कल्याणीय,

तुम्हारे पत्र को पढ़कर हँसी भी आयी और कुछ दुःख भी हुआ। हँसी का कारण यह है कि बदहजमी के फलस्वरूप कोई स्वप्न देखकर उसे सत्य समझते हुए तुमने स्वयं को दुःखी बनाया है; तुमको उससे दुःख हुआ, यह इसीसे स्पष्ट है कि तुम्हारा शरीर ठीक नहीं है – तुम्हारी स्नायुओं के लिए विश्राम लेना परम आवश्यक है।

मैने कभी भी तुमको अभिशाप नहीं दिया है, फिर आज क्यों देने लगा? आज तक मेरे प्यार का परिचय पाने के बाद क्या तुम लोगों को अब अविश्वास होने लगा? यह ठीक है कि मेरा मिजाज हमेशा से ही तेज है, ख़ासकर आजकल बीमारी में वह कभी कभी बहुत ही भयंकर हो उठता है – किन्तु तुम यह निश्चित जानना कि मेरा प्यार कभी नष्ट होने का नहीं है।

इस समय मेरा शरीर कुछ ठीक चल रहा है। मद्रास में क्या वर्षा शुरू हो गयी है? दक्षिण में वर्षा प्रारम्भ होते ही सम्भवतः बम्बई तथा पूना होता हुआ मैं मद्रास पहुँचूँगा। वर्षा प्रारम्भ होते ही मैं समझता हूँ मद्रास की प्रचण्ड गर्मी भी घट जायगी।

सबसे मेरा हार्दिक स्नेह कहना तथा तुम स्वयं भी ग्रहण करना।

शरत् कल दार्जिलिंग से मठ आ पहुँचा है – उसका शरीर भी पहले से बहुत कुछ अच्छा है। पूर्वी बंगाल तथा आसाम का दौरा कर मैं भी यहाँ आ पहुँचा हूँ। सभी कार्यों में उतार-चढ़ाव होता है – उसमें कभी तीव्रता आती है, कभी शिथिलता। सक्रियता आयेगी। भय की क्या बात है?…

अस्तु मैं चाहता हूँ कि कुछ दिन के लिए काम-काज बन्द कर तुम सीधे मठ चले आओ – यहाँ पर महीने भर विश्राम करने के बाद हम दोनों साथ साथ एक महाभ्रमण प्रारम्भ कर देंगे। गुजरात, बम्बई, पूना, हैदराबाद, मैसूर होते हुए मद्रास तक। क्या यह अति सुन्दर न होगा? यदि यह सम्भव न हो, तो कम से कम मद्रास का ‘लेक्चर’ इस समय महीने भर के लिए स्थगित कर दो – थोड़ा खाओ-पिओ और सुख की नींद सोओ। दो-तीन महीने के अन्दर ही मैं वहाँ आ रहा हूँ। अस्तु, पत्र के मिलते ही इस बारे में विचार-विमर्श कर अपना निर्णय लिखना। इति।

साशीर्वाद,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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