स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी सारदानन्द को लिखित (23 दिसम्बर, 1895)

(स्वामी विवेकानंद का स्वामी सारदानन्द को लिखा गया पत्र)

२२८ पश्चिम ३९वाँ रास्ता,
न्यूयार्क,
२३ दिसम्बर, १८९५

प्रिय शरत् ,

तुम्हारे पत्र से केवल मुझे दुःख ही हुआ। मालूम होता है कि तुम एकदम हतोत्साह हो चुके हो। मैं तुम सभी लोगों के बारे में जानता हूँ कि तुम लोगों में कितनी शक्ति है और तुम लोगों की क्या सीमाएँ हैं। तुम लोग जिस कार्य को नहीं कर सकते, ऐसे किसी कार्य को करने के लिए कहने का मेरा कोई अभिप्राय नहीं था। मेरी तो सिर्फ़ इतनी ही इच्छा थी कि तुम लोग प्राथमिक संस्कृत की शिक्षा दो तथा ‘कोष’ इत्यादि की सहायता से ‘स’ को उसके अनुवाद एवं शिक्षणकार्य़ में सहायता प्रदान करो। मैं तुम लोगों को इस कार्य के लिए उपयोगी बना लेता, यदि तुममें से कोई भी इस कार्य को कर सकता ; केवल थोड़े से संस्कृत-ज्ञान की आवश्यकता है। खैर, सब कुछ अच्छे के लिए ही होता है। यदि यह प्रभु का कार्य हो, तो उचित समय पर योग्य व्यक्ति अवश्य ही तदनुरूप कार्य में आकर सम्मिलित होंगे। इसलिए तुम लोगों को व्यर्थ में असन्तुष्ट नहीं होना चाहिए।

जहाँ तक सान्याल का सम्बन्ध है, कौन धन ले रहा है और कौन नहीं, इसकी मुझे कोई चिन्ता नहीं है, किंन्तु बाल-विवाह से मुझे अत्यन्त घृणा है। इसके लिए मैंने अनेक कष्ट भोगे हैं और इस महापाप के लिए हमारे राष्ट्र को भी बहुत कुछ कष्ट उठाना पड़ रहा है। इसलिए इस प्रकार की पैशाचिक प्रथा को परोक्ष अथवा अपरोक्ष किसी भी प्रकार से सहायता पहुँचाना मेरी दृष्टि में नितान्त घृणास्पद कार्य है। इस विषय में मैंने अपना विचार तुमको स्पष्ट लिख दिया है। सान्याल को कानून तथा अदालत का आश्रय लेकर अपने को मुक्त करने के लिए मुझे इस प्रकार धोखा देने का कोई भी अधिकार नहीं है; मैंने उसका कोई अनिष्ट नहीं किया है। उसके इस कपटाचरण से मैं दुःखी हूँ। यही दुनिया है! यदि तुम किसी का उपकार करो, तो लोग उसे कोई महत्त्व नहीं देंगे, किंतु ज्यों ही तुम उस कार्य को बन्द कर दो, वे तुरन्त (ईश्वर न करे) तुम्हें बदमाश प्रमाणित करनें में नहीं हिचकिचायेंगे। मेरे जैसे भावुक व्यक्ति अपने सगे-स्नेहियों द्वारा सदा ठगे जाते हैं। यह संसार बेरहम है। इसमें जब हम मोल लिये हुए दासों की तरह रह सकेंगे, तभी लोग हमारे प्रति सहानुभूति दिखायेंगे, अन्यथा नहीं। मेरे लिए यह दुनिया बहुत बड़ी है, उसमें मेरे लिए किसी भी कोने में थोड़ा सा स्थान अवश्य होगा। यदि भारत के लोग मुझे न चाहें, तो भारत के बाहर मुझे चाहनेवाले कुछ लोग अवश्य मिल जायेंगे। इस राक्षसी बाल-विवाह-प्रथा के विरुद्ध मैं यथासाध्य लड़ता रहूँगा। इससे तुम लोगों के लिए किसी प्रकार की निन्दा नहीं होगी। यदि तुम डर गये हो, तो दूर रहो। जिस प्रथा के अनुसार अबोध बालिकाओं का पाणिग्रहण होता है, उसके साथ मै किसी प्रकार का संबंध रखने में असमर्थ हूँ। ईश्वर करे कि उन लोगों के साथ मुझे कभी भी सम्बन्धित न रहना पड़े। म – बाबु के बारे में सोचो तो सही, ऐसा डरपोक तथा निष्ठुर व्यक्ति क्या कभी तुमने देखा है? जो व्यक्ति किसी अबोध बालिका के लिए पति ढूँढ़ता है, मैं उसकी हत्या तक कर सकता हूँ। बात यह है कि मैं अपने कार्य में सहायता करने के लिए ऐसे व्यक्ति चाहता हूँ, जो वीर, साहसी, उत्साही तथा तेजस्वी हों। अन्यथा मैं अकेला ही कार्य करूँगा। मुझे संसार में एक ख़ास उद्देश्य पूरा कर जाना है। मैं अकेला ही उसे कार्य में परिणत करूँगा। किसीने मेरी सहायता की या नहीं की, इसकी मुझे कोई चिन्ता नही है। सान्याल को संसार ने ग्रस लिया है। बच्चे, इससे सतर्क रहो – यही मेरा कुल उपदेश है, जिसे कर्तव्य से प्रेरित होकर मैं तुम्हें दे रहा हूँ। यह ठीक है कि तुम लोग अब बहुत कुछ समझदार बन चुके हो – तुम्हारे समीप अब मेरी बात का कोई मूल्य नहीं है। किंतु

मैं आशा करता हूँ कि भविष्य में तुम लोगों के लिए ऐसा समय आयेगा, जब तुम्हारी दृष्टि खुल जायगी, तब बहुत कुछ समझ सकोगे और दूसरे तरीक़े से सोच सकोगे।

अब बिदा दो। और अधिक मैं तुम लोगों को परेशान करना नहीं चाहता, तुम्हारा मंगल हो। अगर तुम ऐसा मानते हो, तो मुझे खुशी है कि कभी कभी मैं तुम लोगों के थोड़े-बहुत काम आ सका हूँ। मेरे गुरूदेव ने जो कर्तव्य का बोझ मेरे कन्धों पर छोड़ा है, उसे सम्पादन करने का मैं भरसक प्रयत्न कर रहा हूँ, इसके लिए मैं अपने से संतुष्ट हूँ ओर चाहे मेरा प्रयास सम्यक् रूप से कार्य में परिणत हुआ हो या नहीं, मैंने प्रयास किया, इसीसे मैं संतुष्ट हूँ। अतः मैं बिदा चाहता हूँ। सान्याल से कहना कि उसके प्रति मेरे मन में कोई क्रोध नहीं है, किंतु मैं दुःखी, बहुत दुःखी हूँ। रुपये का मूल्य ही क्या है! रूपयों ने मुझे कोई कष्ट नहीं पहुँचाया, किंतु इसकी चालाकी तथा नीति की अवहेलना से मैं व्यथित हूँ। उससे भी बिदा, और तुम लोगों से बिदा। मेरे जीवन का एक परिच्छेद समाप्त हो चुका है। अब क्रमानुसार और लोग आकर कार्य करें। वे आकर देखेंगे कि मैं सर्वथा प्रस्तुत हूँ। मेरे लिए तुम लोगों को कुछ भी चिंतित होने की आवश्यकता नहीं, मैं किसी भी देश के किसी मानव से किसी प्रकार की सहायता नहीं चाहता। ईश्वर तुम्हारा निरन्तर मंगल करे। बिदा।

विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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