स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी त्रिगुणातीतानन्द को लिखित (22 मार्च, 1896)

(स्वामी विवेकानंद का स्वामी त्रिगुणातीतानन्द को लिखा गया पत्र)

बोस्टन,
२२ मार्च, १८९६

प्रिय सारदा,

तुम्हारे पत्र से सब समाचार विदित हुए। महोत्सव के उपलक्ष्य में मैंने एक तार भेजा था, उसके बारे में तुमने कुछ भी नहीं लिखा है। कई महीने पहले शशि ने जो संस्कृत ‘कोष’ भेजा था, वह तो आज तक नहीं मिला।…मैं शीघ्र ही इंग्लैण्ड जा रहा हूँ। अब शरत् के आने की कोई आवश्यकता नही है ; क्योंकि मैं खुद ही इंग्लैण्ड जा रहा हूँ। जिनको अपना मन स्थिर करने में छः महीने का समय चाहिए उन व्यक्तियों की मुझे आवश्यकता नहीं है। उसे यूरोप भ्रमण के लिए मैंने नहीं बुलाया है और मेरे पास धन भी नहीं है। अतः उसे रवाना होने से मना कर देना, किसीको आने की आवश्यकता नहीं है।

तिब्बत सम्बन्धी तुम्हारे पत्र का विवरण पढ़कर तुम्हारी बुद्धि पर मुझे अश्रद्धा ही हुई। प्रथम नोटोवीच की पुस्तक को ठीक मानना तुम्हारी मूर्खता का सूचक है! क्या तुमने मूल ग्रन्थ देखा है अथवा अपने साथ उसे भारत में लाने का कष्ट किया है? दूसरा यह कि ईसा मसीह तथा समरिया देश की नारी के चित्र तुमने कैलास के मठ में देखे हैं – यह तुमको कैसे पता चला कि वह ईसा मसीह का ही चित्र है और किसीका नहीं? यदि तुम्हारी बात मान भी ली जाय, तो भी तुमने यह कैसे समझा कि किसी ईसाई के द्वारा वह चित्र उक्त मठ में नहीं रखा गया है? तिब्बतियों के बारे में तुम्हारी धारणाएँ ग़लत हैं। तुमने तिब्बत का मर्म-स्थान तो देखा नहीं – केवल मात्र वाणिज्यपथ के कुछ अंश को देखा है। उन स्थलों में केवल मात्र dregs of a nation (जाति का निकृष्ट भाग) ही दिखायी देता है। कलकत्तें का चीनाबाजार तथा बड़ाबाजार देखकर यदि कोई प्रत्येक बंगाली को चोर कहे, तो क्या उसका कथन यथार्थ में ठीक है?

शशि के साथ विशेष रूप से परामर्श कर लेख आदि लिखना।… तुम्हारे लिए सबसे आवश्यक वस्तु आज्ञा-पालन है।

नरेन्द्र

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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