ज्ञानयोग पर सप्तम प्रवचन – स्वामी विवेकानंद

“ज्ञानयोग पर सप्तम प्रवचन” में स्वामी विवेकानंद आत्मा के स्वरूप की व्याख्या कर रहे हैं। साथ ही वे ज्ञानकांड की शिक्षाओं को समझाते हैं। पढ़ें “ज्ञानयोग पर सप्तम प्रवचन”। स्वामी विवेकानंद की प्रस्तुत पुस्तक के शेष प्रवचन पढ़ने के लिए कृपया यहाँ जाएँ – ज्ञानयोग पर प्रवचन

विश्व में आत्मा सभी का अधिष्ठान है, किन्तु वह स्वयं कभी उपाधिविशिष्ट नहीं हो सकती। जब हम जानते हैं कि ‘हम वह हैं’, हम मुक्त हो जाते हैं। मर्त्य के रूप में हम न कभी मुक्त थे और न हो सकते हैं। मुक्त मरणशीलता परस्परविरोधी है। क्योंकि मरणशीलता में परिवर्तन निहित है और केवल अपरिवर्तनशील ही मुक्त हो सकता है। आत्मा ही मुक्त है और वही हमारा यथार्थ सार-तत्त्व है। सभी सिद्धान्तों और विश्वासों के बावजूद, हम इस आन्तरिक मुक्ति का अनुभव करते हैं, हम उसके अस्तित्व को जानते हैं और हर कार्य यह सिद्ध करता है कि हम उसे जानते हैं। इच्छा स्वतन्त्र नहीं है, उसकी आपातदृष् स्वतन्त्रता आत्मा का एक प्रतिबिम्ब मात्र है। यदि संसार कार्य और कारण की एक अनन्त शृंखला होती तो उसके हितार्थ कोई कहाँ खड़ा होता? रक्षक को खड़े होने के लिए सूखी भूमि का एक टुकड़ा तो होना ही चाहिए, अन्यथा वह किसी को कार्यकारण रूप तीव्र धारा से खींचकर कैसे बाहर करेगा और उसे डूबने से बचायगा। वह हठधर्मी भी, जो सोचता है, मैं एक कीड़ा हूँ, समझता है कि वह एक सन्त बनने के मार्ग पर है। वह कीड़े में भी सन्त को देखता है।

मानव-जीवन के दो उद्देश्य या लक्ष्य हैं – विज्ञान और आनन्द। बिना युक्ति के ये दोनों असम्भव हैं। वे समस्त जीवन की कसौटी हैं। हमें शाश्वत एकत्व का इतना अधिक अनुभव करना चाहिए कि यह समझते हुए कि हम ही पाप कर रहे हैं, हम सभी पापियों के लिए रोयें। शाश्वत नियम आत्मत्याग है, आत्म-प्रतिष्ठान नहीं। जब सभी एक हैं तो प्रतिष्ठान किस आत्मा का? कोई ‘अधिकार’ नहीं है, सभी प्रेम है। ईसा ने जिन महान् सत्यों का उपदेश दिया, उनको कभी जीवन में नहीं उतारा गया। आओ, हम उनके मार्ग पर चलकर देखें, क्या संसार को बचाया जा सकता है या नहीं। विपरीत मार्ग ने संसार को लगभग नष्ट कर दिया है। मात्र स्वार्थहीनता ही प्रश्न को हल कर सकती हैं, स्वार्थपरता नहीं। ‘अधिकार’ का विचार एक सीमाकरण है। वास्तव में ‘मेरा और तेरा’ है ही नहीं, क्योंकि मैं तू हूँ और तू मैं है। हमारे पास ‘दायित्व’ है, ‘अधिकार’ नहीं। हमें कहना चाहिए, ‘मैं विश्व हूँ’, न कि ‘मैं जॉन हूँ’ या ‘मैं मेरी हूँ’। ये समस्त सीमाएँ भ्रमजाल हैं जो हमें बन्धन में डाले हुए हैं, क्योंकि जैसे ही मैं समझता हूँ, ‘मैं जॉन हूँ’ मैं कुछ वस्तुओं पर अपवर्जित विशेषाधिकार चाहता हूँ, ‘मुझे’ और ‘मेरा’ कहने लगता हूँ और ऐसा करने में निरन्तर नये भेदों का सर्जन करता जाता हूँ। इस प्रकार हर नये भेद के साथ हमारा बन्धन बढ़ता जाता है और हम केन्द्रीय एकत्व और अविभक्त असीम से दूरातिदूर होते जाते हैं। व्यक्ति तो केवल एक है और हममें से प्रत्येक वही है। केवल एकत्व ही प्रेम है और निर्भयता है, पार्थक्य हमें घृणा और भय की ओर ले जाता है। एकत्व ही नियम का प्रतिपालन करता है। यहाँ पृथ्वी पर हम छोटे-छोटे स्थानों को घेर लेने तथा अन्य लोगों को अपवर्जित करने की चेष्टा करते हैं, पर हम आकाश में ऐसा नहीं कर सकते। किन्तु सम्प्रदायवादी धर्म, जब वह यह कहता है कि ‘केवल यही मुक्ति का मार्ग है और अन्य सब मिथ्या है’ तो ऐसा ही करने की चेष्टा करता है। हमारा लक्ष्य इन छोटे घरौंदों को हटाने का, सीमा को इतना विस्तृत करने का है कि वह दिखायी ही न दे, और यह समझने का होना चाहिए कि सभी धर्म ईश्वर की ओर ले जाते हैं। इस छोटे तुच्छ अहं का बलिदान अवश्य होना चाहिए। बपतिस्मा के प्रतीक द्वारा एक नये जीव में इसी सत्य को लक्षित किया जाता है – पुराने आदमी की मृत्यु और नये का जन्म, मिथ्या अहं का नाश और आत्मा, विश्व की एक आत्मा का साक्षात्कार।

वेदों के दो प्रधान भाग हैं, कर्मकाण्ड – कर्म या कार्यसम्बन्धी भाग और ज्ञानकाण्ड – जानने के, सत्य ज्ञान के विषय का भाग। वेदों में हम धार्मिक विचारों के विकास की सम्पूर्ण प्रक्रिया प्राप्त कर सकते हैं। यह इसलिए है कि उच्चतर सत्य की प्राप्ति होने पर, उस तक पहुँचानेवाली निम्नतर अनुभूति को भी सुरक्षित रखा गया। ऐसा ऋषियों ने यह अनुभव करके किया कि सृष्टिजन्य यह संसार शाश्वत है, अतः उसमें सदा ऐसे लोग रहेंगे जिन्हें ज्ञान के प्रथम सोपानों की आवश्यकता रहेगी; सर्वोच्च दर्शन यद्यपि सभी के लिए सुलभ है, पर सभी उसे ग्रहण तो नहीं कर सकते। प्रायः अन्य सभी धर्मों में सत्य के केवल अन्तिम अथवा उच्चतम साक्षात्कार को ही सुरक्षित रखा गया, जिसका स्वाभाविक फल यह हुआ कि प्राचीनतर धारणाएँ विलुप्त हो गयीं। नवीन को केवल थोड़े से लोग ही समझ पाते हैं और शनैः-शनैः अधिकांश जन के निकट उनका कोई अर्थ नहीं रह जाता। हम इस फल को प्राचीन परम्पराओं और अधिकारियों के विरुद्ध बढ़ते हुए विद्रोह के रूप में स्पष्ट देखते हैं। उन्हें स्वीकार करने के स्थान पर आज का मनुष्य साहसपूर्वक उन्हें चुनौती देता है कि वे अपने दावे के कारण बतायें और उन आधारों को स्पष्ट करें, जिन पर कि वे उनकी स्वीकृति की माँग करते हैं। ईसाई धर्म में बहुत कुछ तो प्राचीन मूर्तिपूजकों की आस्थाओं और रीतियों को नये नाम और अर्थ देना मात्र है। यदि प्राचीन स्रोत सुरक्षित रखे गये होते और परिवर्तन के कारणों की व्याख्या पूर्ण रूप से कर दी गयी होती तो बहुत-सी बातें अधिक स्पष्ट हो जातीं। वेदों ने पुराने विचारों को सुरक्षित रखा, और इस तथ्य ने उनकी व्याख्या तथा वे क्यों सुरक्षित रखे गये, यह स्पष्ट करने के निमित्त विशाल टीकाओं की आवश्यकता उत्पन्न कर दी। उनके अर्थ के विलुप्त हो जाने के बाद भी उनसे, पुराने रूपों से, चिपके रहने के कारण अनेक अन्धविश्वासियों की उत्पत्ति हुई। अनेक अनुष्ठानों में ऐसे शब्द दुहराये गये हैं जो कि एक विस्मृत भाषा के अवशेष हैं और जिनका अब कोई सच्चा अर्थ नहीं किया जा सकता। विकासवाद का विचार वेदों में ईसाई युग से बहुत पूर्व पाया जाता है, पर जब तक डारविन ने उसे सत्य नहीं माना, तब तक उसे केवल हिन्दू अन्धविश्वास माना जाता था !

कर्मकाण्ड में बाह्य प्रार्थना और उपासना के सभी रूप सम्मिलित हैं। यदि इन्हें निःस्वार्थ भाव से सम्पन्न किया जाय और उन्हें मात्र रूढ़ि न बना दिया जाय तो वे उपयोगी हैं। वे हृदय को निर्मल करते हैं । कर्मयोगी स्वयं अपनी मुक्ति के पूर्व अन्य सब की मुक्ति चाहता है। उसकी मुक्ति दूसरों की मुक्त्ति में सहायता देने मात्र में है। ‘कृष्ण के सेवकों की पूजा ही सर्वोच्च पूजा है।’ एक महान् सन्त की यह प्रार्थना रहती थी, ‘मैं समस्त संसार के पाप लेकर नरक में चला जाऊँ किन्तु संसार मुक्त हो जाय।’ यह सच्ची पूजा तीव्र आत्म-त्याग का मार्ग दिखाती है। एक महात्मा के विषय में कहा जाता है कि वह अपने सब सद्गुण अपने कुत्ते को दे देना चाहते थे, जिससे वह स्वर्ग जा सके। वह कुत्ता दीर्घ काल तक उनका स्वामिभक्त रहा था, और वे स्वयं नरक जाने में भी सन्तुष्ट थे।

ज्ञानकाण्ड यह शिक्षा देता है कि केवल ज्ञान ही मुक्ति दे सकता है, अर्थात् उसे मुक्ति प्राप्ति की पात्रता की सीमा तक ज्ञानी होना चाहिए। ज्ञान, ज्ञात का स्वयं अपने को जानना, पहला लक्ष्य है। एक मात्र विषयी आत्मा, अपने व्यक्ति रूप में केवल स्वयं को ही खोज रही है। जितना ही अच्छा दर्पण होता है, वह उतनी ही अच्छी प्रतिच्छाया प्रदान करता है। इस प्रकार मनुष्य सर्वोत्तम दर्पण है और मनुष्य जितना निर्मल होगा, उतना ही स्वच्छता से वह ईश्वर को प्रतिबिम्बित कर सकेगा। मनुष्य अपने को ईश्वर से पृथक् करने और देह से अपने को अभिन्न मानने की भूल करता है। यह भूल माया से होती है, जो एकदम भ्रम-जाल तो नहीं है, पर उसे सत्य को जैसा कि वह है वैसा न देखकर किसी अन्य रूप में देखना कहा जा सकता है। अपने को शरीर से अभिन्न मानने से असमता का मार्ग खुलता है, जिससे अनिवार्यतया ईर्ष्या और संघर्ष की उत्पत्ति होती है। और जब तक हम असमता देखते रहेंगे, हम सुख नहीं पा सकते। ज्ञान कहता है कि अज्ञान और असमता ही समस्त दुःख के स्रोत हैं।

जब मनुष्य संसार की पर्याप्त ठोकरें खा चुकता है, तब वह मुक्ति-प्राप्ति की इच्छा के प्रति जाग्रत होता है और पार्थिव अस्तित्व के निरानन्द चक्र से बचने के साधनों को खोजता हुआ वह ज्ञान खोजता है, इस बात को जान जाता है कि वह वस्तुतः क्या है और मुक्त हो जाता है। उसके बाद वह संसार को एक विशाल यन्त्र के रूप में देखता है, किन्तु उसके चक्कों से अपनी अँगुलियों को बाहर रखने के प्रति काफी सावधान रहता है। जो मुक्त है, उसके लिए कर्तव्य समाप्त हो जाता है। मुक्त प्राणी को कौन शक्ति विवश कर सकती है? वह शुभ करता है, क्योंकि यह उसका स्वभाव है, न कि इसलिए कि कोई काल्पनिक कर्तव्य उसे आदेश देता है। यह उन पर लागू नहीं होता, जो कि अब भी इन्द्रियों के बन्धन में हैं। यह मुक्ति उसी के लिए है जो अपने निरन्तर अहं से ऊँचा उठ चुका है। वह अपनी आत्मा में ही प्रतिष्ठित है, कोई नियम नहीं मानता, स्वतन्त्र और पूर्ण है। उसने पुराने अन्धविश्वासों को उच्छिन्न कर डाला है। वह चक्र के बाहर निकल आया है। प्रकृति तो हमारे अपने स्व का दर्पण है । मनुष्य की कार्यशक्ति की एक सीमा है, किन्तु कामनाओं की नहीं; इसलिए हम दूसरों की कार्यशक्ति को हस्तगत करने का प्रयत्न करते है और स्वयं काम करने से बचकर उनके श्रम के फल का उपभोग करते हैं। हमारे निमित्त कार्य करने के लिए यन्त्रों का आविष्कार कल्याण की मात्रा में वृद्धि नहीं कर सकता, क्योंकि कामना की तुष्टि में हम केवल कामना ही पाते हैं, और तब अधिक तथा और भी अधिक की अनन्त कामना करते हैं। अतृप्त कामनाओं से भरे हुए मरने पर, उनकी परितुष्टि की निरर्थक खोज में बारम्बार जन्म लेना पड़ता है। हिन्दू कहते हैं कि मानव-शरीर पाने के पूर्व हम ८० लाख बार शरीर धारण कर चुके हैं। ज्ञान कहता है, ‘कामना का हनन करो और इस प्रकार उससे छुटकारा पाओ’। यही एकमात्र मार्ग है। सभी प्रकार की कारणता को निकाल फेंको और आत्मा का साक्षात्कार करो। केवल मुक्ति ही सच्ची नैतिकता उत्पन्न कर सकती है। यदि कारण और कार्य की एक अनन्त श्रृंखला मात्र का ही अस्तित्व होता तो निर्वाण हो ही नहीं सकता था। वह तो इस शृंखला से जकड़े आभासी अहं का उच्छेद करना है। यही है वह जिससे मुक्ति का निर्माण होता है और वह है कारणता के परे जाना।

हमारा वास्तविक स्वरूप शुभ है, मुक्त है, विशुद्ध सत् है, जो न तो कभी अशुद्ध हो सकता है और न अशुद्ध कर सकता है। जब हम अपनी आँखों और मस्तिष्क से ईश्वर को पढ़ते हैं तो हम उसे यह या वह कहते हैं, पर वास्तव में केवल एक है, सभी विविधताएँ उसी एक की हमारी व्याख्या हैं। हम ‘हो’ कुछ भी नहीं जाते, हम अपनी वास्तविक आत्मा को पुनः प्राप्त करते हैं। बुद्ध के द्वारा दुःख को ‘अविद्या और जाति’ (असमता) के फल से उत्पन्न मानने के निदान को वेदान्तियों ने अपना लिया है; क्योंकि वह अब तक ऐसे किये गये प्रयत्नों में सर्वोत्कृष्ट है। उससे मनुष्यों में इस महानतम व्यक्ति की आश्चर्यजनक अन्तर्दृष्टि व्यक्त होती है। तो हम सब वीर और सच्चे बनें। जो भी मार्ग हम श्रद्धापूर्वक अपनायें निश्चय ही मुक्ति की ओर से जायगा। शृंखला की एक कड़ी पकड़ लो और धीरे-धीरे क्रमशः पूरी शृँखला अवश्य आती जाएगी। पेड़ की जड़ को जल देने से पूरे पेड़ को जल मिलता है, हर पत्ती को जल देने में समय खराब करने से कोई लाभ नहीं। अर्थात्, हम प्रभु को खोजें और उसे पाकर हम सब पा जाएँगे। गिरजे, सिद्धान्त, रूप ये सब तो धर्म के सुकुमार पौधे की रक्षार्थ झाड़ियों के घेरों के सदृश हैं, किन्तु आगे चलकर उनको तोड़ना ही पड़ेगा, जिससे वह छोटा पौधा पेड़ बन सके। इस प्रकार विभिन्न धार्मिक सम्प्रदाय, धर्मग्रन्थ, वेद और धर्म-शास्त्र इस छोटे पौधे के केवल ‘गमले’ मात्र हैं; किन्तु उसे गमले से निकालना और संसार को भरना ही होगा।

जैसे हम अपने को यहाँ अनुभव करते हैं, वैसे ही सूर्य और नक्षत्रों में अनुभव करना हमें सीखना चाहिए। आत्मा तो देशकाल से परे हैं, हर देखनेवाली आँख मेरी है, प्रभु की स्तुति करनेवाला प्रत्येक मुख मेरा मुख है, हर पापी मैं हूँ। हम कहीं भी परिसीमित नहीं हैं, हम शरीर नहीं हैं। विश्व हमारा शरीर हैं। हम तो केवल वह शुद्ध स्फटिक हैं, जो अन्य सभी को प्रतिबिम्बित करता है, किन्तु स्वयं सदैव वही रहता है। हम तो जादूगर हैं जो जादू के डण्डे हिलाते हैं और इच्छानुसार अपने समक्ष दृश्य प्रस्तुत कर लेते हैं, किन्तु हमें इन आभासों के पीछे जाना है और आत्मा को जानना है। यह संसार एक ऐसी बटलोई में जल के समान है जो उबलनेवाली हो। उसमें पहले एक बुलबुला उठता है, फिर दूसरा और फिर बहुतसे, और अन्ततः सब उबल उठता और बाष्प-रूप में निकल जाता है। महान् धर्मोपदेशक आरम्भ में उठनेवाले बुलबुलों के रूप में होते हैं, एक यहाँ, एक वहाँ; किन्तु अन्त में हर जीव को बुलबुला होना है और निकल भागना है। नित्य नूतन सृष्टि नया जल लाती रहेगी और सारी प्रक्रिया की आवृत्ति फिर होगी। बुद्ध और ईसा संसार द्वारा ज्ञात दो महत्तम ‘बुलबुले’ हैं। वे महान् आत्माएँ थीं, जिन्होंने स्वयं मुक्ति प्राप्त करके, दूसरों को बच निकलने में सहायता दी। दोनों में से कोई पूर्ण नहीं था, किन्तु उन पर निर्णय उनके गुणों से करना है, उनकी कमियों से नहीं। ईसा कुछ छोटे पड़ते हैं, क्योंकि सदैव अपने सर्वोच्च आदर्श के अनुरूप नहीं रह सके और सब से अधिक इसलिए कि उन्होंने स्त्री को पुरुष के साथ बराबर स्थान नहीं दिया। स्त्री ने इनके लिए सब कुछ किया, किन्तु एक को भी धर्मदूत नहीं बनाया गया। उनका सेमेटिक होना ही निस्सन्देह इसका कारण था। महान् आर्यों ने तथा शेष में बुद्ध ने स्त्री को सदैव पुरुष के बराबर स्थान में रखा है। उनके लिए धर्म में लिंगभेद का अस्तित्व न था। वेदों और उपनिषदों में स्त्रियों ने सर्वोच्च सत्यों को शिक्षा दी है और उनको वही श्रद्धा प्राप्त हुई है, जैसी कि पुरुषों को।

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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