हमारा प्रस्तुत कार्य – स्वामी विवेकानंद

“हमारा प्रस्तुत कार्य” नामक यह व्याख्यान ट्रिप्लिकेन, मद्रास की साहित्य-समिति में दिया गया था। अमेरिका जाने के पहले स्वामी विवेकानन्दजी का इस समिति के सदस्यों से परिचय हुआ था। इन सदस्यों के साथ स्वामी विवेकानंद ने अनेक विषयों पर चर्चा की थी। इससे वे सदस्यगण तथा मद्रास की जनता बहुत ही प्रभावित हुई थी। अन्त में इन सज्जनों के विशेष आग्रह एवं प्रयत्न से ही वे अमेरिका की शिकागो धर्म-महासभा में हिन्दू धर्म के प्रतिनिधि के रूप में भेजे गये थे। अतएव इस व्याख्यान का एक विशेष महत्त्व है।

स्वामीजी का “हमारा प्रस्तुत कार्य” विषयक भाषण

संसार ज्यों ज्यों आगे बढ़ रहा है, त्यों त्यों जीवसमस्या गहरी और व्यापक हो रही है। उस पुराने जमाने में जब कि समस्त जगत् के अखण्डत्वरूप वैदान्तिक सत्य का प्रथम आविष्कार हुआ था, तभी से उन्नति के मूलमन्त्रों और सारतत्त्वों का प्रचार होता आ रहा है। विश्वब्रह्माण्ड का एक परमाणु सारे संसार को अपने साथ बिना घसीटे तिल भर भी नहीं हिल सकता। जब तक सारे संसार को साथ साथ उन्नति के पथ पर आगे नहीं बढ़ाया जाएगा, तब तक संसार के किसी भी भाग में किसी भी प्रकार की उन्नति सम्भव नहीं है। और दिन-प्रतिदिन यह और भी स्पष्ट हो रहा है कि किसी प्रश्न की मीमांसा सिर्फ जातीय, राष्ट्रीय या किन्हीं संकीर्ण भूमियों पर नहीं टिक सकती। हर एक विषय को तथा हर एक भाव को तब तक बढ़ाना चाहिए, जब तक उसमें सारा संसार न आ जाए, हर एक आकांक्षा को तब तक बढ़ाते रहना चाहिए, जब तक वह समस्त मनुष्यजाति को ही नहीं, वरन् समस्त प्राणिजगत् को आत्मसात न कर ले। इससे विदित होगा कि क्यों हमारा देश गत कई सदियों से वैसा महान् नहीं रह गया है, जैसा वह प्राचीन काल में था। हम देखते है कि जिन कारणों से वह गिर गया है, उनमें से एक कारण है, दृष्टि की संकीर्णता तथा कार्यक्षेत्र का संकोच।

जगत् में ऐसे दो आश्चर्यजनक राष्ट्र हो गये हैं, जो एक ही जाति से प्रस्फुटित हुए हैं, परन्तु भिन्न परिस्थितियों और घटनाओं में स्थापित रहकर हर एक ने जीवन की समस्याओं को अपने ही निराले ढंग से हल कर लिया है – मेरा मतलब प्राचीन हिन्दू और प्राचीन यूनानी जातियों से हैं। भारतीय आर्यों की उत्तरी सीमा हिमालय की उन बर्फीली चोटियों से घिरी हुई है, जिनके तल में समभूमि पर समुद्र सी स्वच्छतोया सरिताएँ हिलोरें मार रही हैं और वहाँ वे अनन्त अरण्य वर्तमान है, जो आर्यों को संसार के अन्तिम छोर से प्रतीत हुए। इन सब मनोरम दृश्यों को देखकर आर्यों का मन सहज ही अन्तर्मुख हो उठा। आर्यों का मस्तिष्क सूक्ष्म भावग्राही था, और चारों ओर घिरी हुई महान् दृश्यावली देखने का यह स्वाभाविक फल हुआ कि आर्य अन्तस्तत्त्व के अनुसन्धान में लग गए, चित्त का विश्लेषण भारतीय आर्यों का मुख्य ध्येय हो गया। दूसरी ओर यूनानी जाति संसार के एक दूसरे भाग में पहुँची, जो उदात्त की अपेक्षा सुन्दर अधिक थी। यूनानी टापुओं के भीतर के वे सुन्दर दृश्य, उनके चारों ओर की वह हास्यमयी किन्तु निराभरण प्रकृति देखकर यूनानी का मन स्वभावतः बहिर्मुख हुआ और उसने बाह्य संसार का विश्लेषण करना चाहा। परिणामतः हम देखते हैं कि समस्त विश्लेषणात्मक विज्ञानों का विकास भारत से हुआ और सामान्यीकरण के विज्ञानों का विकास यूनान से। हिन्दुओं का मानस अपनी ही कार्यदिशा में अग्रसर हुआ और उसने अद्भुत परिणाम प्राप्त किये। यहाँ तक कि वर्तमान समय में भी, हिन्दुओं की वह विचारशक्ति – वह अपूर्व शक्ति जिसे भारतीय मस्तिष्क अब तक धारण करता है – बेजोड़ है। हम सभी जानते हैं कि हमारे लड़के दूसरे देश के लड़कों से प्रतियोगिता में सदा ही विजय प्राप्त करते हैं। परन्तु साथ ही, शायद मुसलमानों के विजय प्राप्त करने के दो शताब्दी पहले ही जब हमारी जातीय शक्ति क्षीण हुई, उस समय हमारी यह जातीय प्रतिभा ऐसी अतिरंजित हुई कि वह स्वयं ही अधःपतन की ओर अग्रसर हुई, और वही अधःपतन अब भारतीय शिल्प, संगीत, विज्ञान आदि हर विषय में दिखाई दे रहा है। शिल्प में अब वह व्यापक परिकल्पना नहीं रह गयी, भावों की वह उदात्तता तथा रूपाकार के सौष्ठव की वह चेष्टा अब और नहीं रह गयी, किन्तु उसकी जगह अत्यधिक अलंकरण तथा भड़कीलेपन का समावेश हो गया। जाति की सारी मौलिकता नष्ट हो चली। संगीत में चित्त को मस्त कर देनेवाले वे गम्भीर भाव, जो प्राचीन संस्कृत में पाये जाते हैं, अब नहीं रहे – पहले की तरह उनमें से प्रत्येक स्वर अब अपने पैरों नहीं खड़ा हो सकता, वह अपूर्व एकतानता नहीं छेड़ सकता। हर एक स्वर अपनी विशिष्टता खो बैठा। हमारे समग्र आधुनिक संगीत में नाना प्रकार के स्वर-रागों की खिचड़ी हो गयी है, उसकी बहुत ही बुरी दशा हो गयी है। संगीत की अवनति का यही चिह्न है। इसी प्रकार यदि तुम अपनी भावात्मक परिकल्पनाओं का विश्लेषण करके देखो तो तुमको वही अतिरंजना और अलंकरण की ही चेष्टा और मौलिकता का नाश मिलेगा। और, यहाँ तक कि तुम्हारे विशेष क्षेत्र धर्म में भी, वही भयानक अवनति हुई है। उस जाति से तुम क्या आशा कर सकते हो, जो सैकड़ों वर्ष तक यह जटिल प्रश्न हल करती रह गयी कि पानी भरा लोटा दाहिने हाथ से पीना चाहिए या बायें हाथ से। इससे और अधिक अवनति क्या हो सकती है कि देश के बड़े बड़े मेधावी मनुष्य भोजन के प्रश्न को लेकर तर्क करते हुए सैकड़ों वर्ष बिता दें, इस बात पर वाद-विवाद करते हुए कि तुम हमें छूने लायक हो या हम तुम्हें, और इस छूत-अछूत के कारण कौनसा प्रायश्चित्त करना पड़ेगा? वेदान्त के वे तत्त्व, ईश्वर और आत्मा-सम्बन्धी सब से उदात्त तथा महान् सिद्धान्त जिनका सारे संसार में प्रचार हुआ था, प्रायः नष्ट हो गये, निबिड़ अरण्यनिवासी कुछ संन्यासियों द्वारा रक्षित होकर वे छिपे रहे और शेष सब लोग केवल छूत-अछूत, खाद्य-अखाद्य और वेशभूषा जैसे गुरुतर प्रश्नों को हल करने में व्यस्त रहे! हमें मुसलमानों से कई अच्छे विषय मिले, इसमें कुछ सन्देह नहीं – संसार में हीनतम मनुष्य भी श्रेष्ठ मनुष्यों को कुछ न कुछ शिक्षा अवश्य दे सकते हैं – किन्तु वे हमारी जाति में शक्तिसंचार नहीं कर सके।

इसके पश्चात् शुभ के लिए हो, चाहे अशुभ के लिए, भारत में अंग्रेजों की विजय हुई। किसी जाति के लिए विजित होना निःसन्देह बुरी चीज है; विदेशियों का शासन कभी भी कल्याणकारी नहीं होता। किन्तु तो भी, अशुभ के माध्यम से कभी कभी शुभ का आगमन होता है। अतएव अंग्रेजों की विजय का शुभ फल यह है : इंग्लैण्ड तथा समग्र यूरोप को सभ्यता के लिए यूनान के प्रति ऋणी होना चाहिए, क्योंकि यूरोप के सभी भावों में मानो यूनान की ही प्रतिध्वनि सुनाई दे रही है, यहाँ तक कि उसके हर एक मकान में, मकान के हर एक फर्नीचर में यूनान की ही छाप दीख पड़ती है। यूरोप के विज्ञान, शिल्प आदि सभी यूनान ही के प्रतिबिम्ब हैं। आज वही प्राचीन यूनान तथा प्राचीन हिन्दू भारतभूमि पर मिल रहे हैं। इस प्रकार धीर और निःस्तब्ध भाव से एक परिवर्तन आ रहा है और आज हमारे चारों ओर जो उदार, जीवनप्रद पुनरुत्थान का आन्दोलन दिखाई दे रहा है, वह सब इन दो विभिन्न भागों के सम्मिलन का ही फल है। अब मानवजीवन-सम्बन्धी अधिक व्यापक और उदार धारणाएँ हमारे सम्मुख हैं। यद्यपि हम पहले कुछ भ्रम में पड़ गये थे और भावों को संकीर्ण करना चाहते थे, पर अब हम देखते हैं कि आजकल ये जो महान् भाव और जीवन की ऊँची धारणाएँ काम कर रही है, हमारे प्राचीन ग्रन्थों में लिखे हुए तत्त्वों की स्वाभाविक परिणति ही है। ये उन बातों का यथार्थ न्यायसंगत कार्यान्वय मात्र हैं, जिनका हमारे पूर्वजों ने पहले ही प्रचार किया था। विशाल बनना, उदार बनना, क्रमशः सार्वभौम भाव में उपनीत होना – यही हमारा लक्ष्य है। परन्तु हम ध्यान न देकर अपने शास्त्रोपदेशों के विरुद्ध दिनोंदिन अपने को संकीर्ण से संकीर्णतर करते जा रहे हैं।

हमारी उन्नति के मार्ग में कुछ विघ्न है और उनमें प्रधान है, हमारी यह धारणा कि संसार में हम सर्वोच्च जाति के हैं। मैं हृदय से भारत को प्यार करता हूँ, स्वदेश के हितार्थ मैं सदा कमर कसे तैयार रहता हूँ, पूर्वजों पर मेरी आन्तरिक श्रद्धा और भक्ति है, फिर भी मैं अपना यह विचार नहीं त्याग सकता कि संसार से हमें भी बहुत कुछ शिक्षा प्राप्त करनी है, शिक्षाग्रहणार्थ हमें सब के पैरों तले बैठना चाहिए, क्योंकि ध्यान इस बात पर देना आवश्यक है कि सभी हमें महान् शिक्षा दे सकते हैं। हमारे महान् श्रेष्ठ स्मृतिकार मनु महाराज की उक्त्ति है, ‘नीच जातियों से भी श्रद्धा के साथ हितकारी विद्या ग्रहण करनी चाहिए, और निम्नतम अन्त्यज ही क्यों न हो, सेवा द्वारा उससे भी श्रेष्ठ धर्म की शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए।’1

अतएव यदि हम मनु की सच्ची सन्तान हैं तो हमें उनके आदेशों का अवश्य ही पालन करना चाहिए और जो कोई हमें शिक्षा देने के योग्य है, उसी से ऐहिक या पारमार्थिक विषयों में शिक्षा ग्रहण करने के लिए हमें सदा तैयार रहना चाहिए। किन्तु साथ ही यह भी न भूलना चाहिए कि संसार को हम भी कोई विशेष शिक्षा दे सकते हैं। भारत का बाहर के देशों से सम्बन्ध जोड़े बिना हमारा काम नहीं चल सकता। किसी समय हम लोगों ने जो इसके विपरीत सोचा था, वह हमारी मूर्खता मात्र थी और उसी की सजा का फल है कि हजारों वर्षों से हम दासता के बन्धनों में बँध गये हैं। हम लोग दूसरी जातियों से अपनी तुलना करने के लिए विदेश नहीं गये और हमने संसार की गति पर ध्यान रखकर चलना नहीं सीखा। यही है भारतीय मन की अवनति का प्रधान कारण। हमें पर्याप्त सजा मिल चुकी, अब हमें ऐसा नहीं करना चाहिए। भारत से बाहर जाना भारतीयों के लिए अनुचित है – इस प्रकार की वाहियात बातें बच्चों की ही है। उन्हें दिमाग से बिल्कुल निकाल फेंकनी चाहिए। जितना ही तुम भारत से बाहर अन्यान्य देशों में घूमोगे, उतना ही तुम्हारा और तुम्हारे देश का कल्याण होगा। यदि तुम पहले ही से – कई सदियों के पहले ही से – ऐसा करते, तो तुम आज उन राष्ट्रों से पदाक्रान्त न होते, जिन्होंने तुम्हें दबाने की कोशिश की। जीवन का पहला और स्पष्ट लक्षण है विस्तार, अगर तुम जीवित रहना चाहते हो, तो तुम्हें विस्तार करना ही होगा। जिस क्षण से तुम्हारे जीवन का विस्तार बन्द हो जाएगा, उसी क्षण से जान लेना कि मृत्यु ने तुम्हें घेर लिया है, विपत्तियाँ तुम्हारे सामने हैं। मैं यूरोप और अमेरिका गया था, इसका तुम लोगों ने सहृदयतापूर्ण उल्लेख किया है। मुझे वहाँ जाना पड़ा, क्योंकि यही विस्तार या राष्ट्रीय जीवन के पुनर्जागरण का पहला चिह्न है। इस फिर से जगनेवाले राष्ट्रीय जीवन ने भीतर ही भीतर विस्तार प्राप्त करके मुझे मानो दूर फेंक दिया था और इस तरह और भी हजारों लोग फेंके जाएँगे। मेरी बात ध्यान से सुनो। यदि राष्ट्र को जीवित रहना है, तो ऐसा होना आवश्यक है। अतएव यह विस्तार राष्ट्रीय जीवन के पुनरभ्युदय का सर्वप्रधान लक्षण है और मनुष्य की सारी ज्ञानसमष्टि तथा समग्र जगत् की उन्नति के लिए हमारा जो कुछ योगदान होना चाहिए, वह भी इस विस्तार के साथ भारत से बाहर दूसरे देशों को जा रहा है। परन्तु यह कोई नया काम नहीं। तुम लोगों में से जिनकी यह धारणा है कि हिन्दू अपने देश की चहारदीवारी के भीतर ही चिरकाल से पड़े हैं, वे बड़ी ही भूल करते हैं। तुमने अपने प्राचीन शास्त्र पढ़े नहीं, तुमने अपने जातीय इतिहास का ठीक ठीक अध्ययन नहीं किया। हर एक जाति को अपनी प्राणरक्षा के लिए दूसरी जातियों को कुछ देना ही पड़ेगा। प्राण देने पर ही प्राणों की प्राप्ति होती है, दूसरों से कुछ लेना होगा तो बदले में मूल्य के रूप में उन्हें कुछ देना ही होगा। हम जो हजारों वर्षों से जीवित हैं, यह हमको विस्मित करता है, और इसका समाधान यही है कि हम संसार के दूसरे देशों को सदा देते रहे हैं, अनजान लोग भले ही जो सोचे।

भारत का दान है धर्म, दार्शनिक ज्ञान और आध्यात्मिकता। धर्मप्रचार के लिए यह आवश्यक नहीं कि सेना उसके आगे आगे मार्ग निष्कंटक करती हुई चले। ज्ञान और दार्शनिक तत्त्व को शोणितप्रवाह पर से ढोने की आवश्यकता नहीं। ज्ञान और दार्शनिक तत्त्व खून से भरे जख्मी आदमियों के ऊपर से सदर्प विचरण नहीं करते। वे शान्ति और प्रेम के पंखों से उड़कर शान्तिपूर्वक आया करते हैं, और सदा हुआ भी यही। अतएव संसार के लिए भारत को सदा कुछ देना पड़ा है। लन्दन में किसी युवती ने मुझसे पूछा, “तुम हिन्दुओं ने क्या किया? तुमने कभी किसी भी जाति को नहीं जीत पाया है।” अंग्रेज जाति की दृष्टि में – वीर साहसी, क्षत्रियप्रकृति अंग्रेज जाति की दृष्टी में – दूसरे व्यक्ति पर विजय प्राप्त करना ही एक व्यक्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ गौरव की बात समझी जाती है। यह उनके दृष्टिकोण से सत्य भले ही हो, किन्तु हमारी दृष्टि इसके बिल्कुल विपरीत है। जब मैं अपने मन से यह प्रश्न करता हूँ कि भारत के श्रेष्ठत्व का क्या कारण है, तब मुझे यह उत्तर मिलता है कि हमने कभी दूसरी जाति पर विजय प्राप्त नहीं की, यही हमारा महान् गौरव है। तुम लोग आजकल सदा यह निन्दा सुन रहे हो कि हिन्दुओं का धर्म दूसरों के धर्म को जीत लेने में सचेष्ट नहीं; और मैं बड़े दुःख से कहता हूँ कि यह बात ऐसे ऐसे व्यक्तियों के मुँह में होती है, जिनसे हम अधिकतर ज्ञान की अपेक्षा करते हैं। मुझे यह जान पड़ता है कि हमारा धर्म दूसरे धर्मों की अपेक्षा सत्य के अधिक निकट है। इस तथ्य के समर्थन की प्रधान युक्ति यही है कि हमारे धर्म ने कभी दूसरे धर्मों पर विजय प्राप्त नहीं की, उसने कभी खून की नदियाँ नहीं बहायी, उसने सदा आशीर्वाद और शान्ति के शब्द कहे, सब को उसने प्रेम और सहानुभूति की वाणी सुनायी। यहीं, केवल यहीं दूसरे धर्म से द्वेष न रखने के भाव सब से पहले प्रचारित हुए, केवल यहीं परधर्मसहिष्णुता तथा सहानुभूति के ये भाव कार्यरूप में परिणत हुए। अन्य देशों में यह केवल सिद्धान्त चर्चा मात्र है। यहीं, केवल यहीं, यह देखने में आता है कि हिन्दू मुसलमानों के लिए मसजिदें और ईसाइयों के लिए गिरजे बनवाते हैं।

अतएव भाइयो, तुम समझ गये होंगे कि किस तरह हमारे भाव धीरे धीरे शान्त और अज्ञात रूप से दूसरे देशों में गये हैं। भारत के सब विषयों में यही बात है। भारतीय विचार का सब से बड़ा लक्षण है, उसका शान्त स्वभाव और उसकी नीरवता। जो प्रभूत शक्ति इसके पीछे है, उसका प्रकाश जबरदस्ती से नहीं होता। भारतीय विचार सदा जादू सा असर करता है। जब कोई विदेशी हमारे साहित्य का अध्ययन करता है तो पहले वह उसे अरुचिपूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि इसमें उसके निज के साहित्य जैसी उद्दीपना नहीं, तीव्र गति नहीं, जिससे उसका हृदय सहज ही उछल पड़े। यूरोप के दुःखान्त नाटकों की हमारे करुण नाटकों से तुलना करो, पश्चिमी नाटक कार्यप्रधान है, वे कुछ देर के लिए उद्दीप्त तो कर देते हैं, किन्तु समाप्त होते ही तुरन्त प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है और तुम्हारे मस्तिष्क से उसका सम्पूर्ण प्रभाव निकल जाता है। भारत के करुण नाटकों में मानो सम्मोहन की शक्ति भरी हुई है। वे मन्दगति से चुपचाप अपना काम करते हैं, किन्तु तुम ज्यों ज्यों उनका अध्ययन करते हो, त्यों त्यों तुम्हें मुग्ध करने लगते हैं। फिर तुम टस से मस नहीं हो सकते, तुम बँध जाते हो। हमारे साहित्य में जिस किसी ने प्रवेश किया, उसे उसका बन्धन अवश्य ही स्वीकार करना पड़ा और चिरकाल के लिए हमारे साहित्य से उनका अनुराग हो गया। अनदेखे और अनसुने गिरनेवाला कोमल ओसकण जिस प्रकार सुन्दरतम गुलाब की कलियों को खिला देता है, वैसा ही असर भारत की देन का संसार की विचारधारा पर पड़ता रहता है। इस शान्त, अज्ञात, किन्तु सर्वशक्तिमान् के प्रभाव ने सारे जगत् की विचारराशि में क्रान्ति मचा दी है – एक नया ही युग खड़ा कर दिया है, किन्तु तो भी कोई नहीं जानता, कब ऐसा हुआ। किसी ने प्रसंगवशात् मुझसे कहा था, “भारत के किसी प्राचीन ग्रन्थकार का नाम ढूँढ़ निकालना कितना कठिन काम है!” इस पर मैंने यह उत्तर दिया कि यही भारतीयों का स्वभाव है। भारत के लेखक आजकल के लेखकों जैसे नहीं थे, जो ग्रन्थों का नब्बे प्रतिशत भाव दूसरे लेखकों से साफ उड़ा लेते हैं और जिनका अपना केवल दशमांश होता है, किन्तु तो भी जो ग्रन्थारम्भ में भूमिका लिखते हुए यह कहते नहीं चूकते कि इन मत-मतान्तरों का पूरा उत्तरदायित्व मुझ पर है। मनुष्यजाति के हृदय में उच्च भाव भरनेवाले वे महामनीषी उन ग्रन्थों की रचना करके ही सन्तुष्ट थे, उन्होंने ग्रन्थों में अपना नाम तक नहीं दिया, और अपने ग्रन्थ भावी पीढ़ियों को सौंपकर उन्होंने शान्तिपूर्वक इस संसार से विदा ली। हमारे दर्शनकारों या पुराणकारों के नाम कौन जानता है? वे सभी व्यास, कपिल आदि उपाधियों ही से परिचित हैं, वे ही श्रीकृष्ण के योग्य सपूत हैं, वे ही गीता के यथार्थ अनुयायी हैं, उन्होंने ही श्रीकृष्ण के इस महान् उपदेश – ‘कर्म में ही तुम्हारा अधिकार है, फल में कदापि नहीं’2 – का पालन कर दिखाया।

मित्रों, इस प्रकार भारत ने संसार में अपना कर्म किया, परन्तु इसके लिए भी एक बात अत्यन्त आवश्यक है। वाणिज्यद्रव्य की भाँति, विचारों का समूह भी किसी के बनाये हुए मार्ग से ही चलता है। विचारराशि के एक देश से दूसरे देश को जाने से पहले, उसके जाने का मार्ग तैयार होना चाहिए। संसार के इतिहास में, जब किसी बड़े दिग्विजयी राष्ट्र ने संसार के भिन्न भिन्न देशों को एक सूत्र में बाँधा है, तब उसके बनाये हुए मार्ग से भारत की विचारधारा बह चली है और प्रत्येक जाति की नस नस में समा गयी है। आये दिन इस प्रकार के प्रमाण जुटते जा रहे हैं कि बुद्ध के जन्म के पहले ही भारत के विचार सारे संसार में फैल चुके थे। बौद्ध धर्म के उदय के पहले ही चीन, फारस और पूर्वी द्वीपसमूहों3 में वेदान्त का प्रवेश हो चुका था। फिर जब यूनान की प्रबल शक्ति ने पूर्वी भूखण्डों को एक ही सूत्र में बाँधा था, तब वहाँ भारत की विचारधारा प्रवाहित हुई थी, और ईसाई धर्मावलम्बी जिस सभ्यता की डींग हाँक रहे हैं, वह भी भारतीय विचारों के छोटे छोटे कणों के संग्रह के सिवा और कुछ नहीं है। बौद्ध धर्म, अपनी समस्त महानता के साथ जिसकी विद्रोही सन्तान है और ईसाई धर्म जिसकी नगण्य नकल मात्र है, वही हमारा धर्म है। युगचक्र फिर घूमा है, वैसा ही समय फिर आया है, इंग्लैण्ड की प्रचण्ड शक्ति ने भूमण्डल के भिन्न भिन्न भागों को फिर एक दूसरे से जोड़ दिया है। अंग्रेजों के मार्ग रोमन जाति के मार्गों की तरह केवल स्थल भाग में ही नहीं, अतल महासागरों के सब भागों में भी दौड़ रहे हैं। संसार के सभी भाग एक दूसरे से जुड़ गये हैं और विद्युतशक्ति नव सन्देशवाहक की भाँति अपना अद्भुत नाटक खेल रही है। इन अनुकूल अवस्थाओं को प्राप्त कर भारत फिर जाग रहा है और संसार की उन्नति तथा सारी सभ्यता को अपने योगदान के लिए वह तैयार हो रहा है। इसी के फलस्वरूप प्रकृति ने मानो जबरदस्ती मुझे धर्म का प्रचार करने के लिए इंग्लैण्ड और अमेरिका भेजा। हममें से हर एक को यह अनुभव करना चाहिए था कि प्रचार का समय आ गया है। चारों ओर शुभ लक्षण दीख रहे हैं और भारतीय आध्यात्मिक और दार्शनिक विचारों की फिर से सारे संसार पर विजय होगी। अतएव हमारे सामने समस्या दिन दिन बृहत्तर आकार धारण कर रही है। क्या हमें केवल अपने ही देश को जगाना होगा? नहीं, यह तो एक तुच्छ बात है। मैं एक कल्पनाशील मनुष्य हूँ – मेरी यह भावना है कि हिन्दू जाति सारे संसार पर विजय प्राप्त करेगी।

जगत् में बड़ी बड़ी विजयी जातियाँ हो चुकी है। हम भी महान् विजेता रह चुके हैं। हमारी विजय की कथा को भारत के महान सम्रट् अशोक ने धर्म और आध्यात्मिकता ही की विजयगाथा बताया है। फिर से भारत को जगत् पर विजय प्राप्त करनी होगी। यही मेरे जीवन का स्वप्न है, और मैं चाहता हूँ कि तुममें से प्रत्येक, जो कि मेरी बातें सुन रहा है, अपने अपने मन में उसी स्वप्न का पोषण करे, और उसे कार्यरूप में परिणत किये बिना न छोड़े। लोग हर रोज तुमसे कहेंगे कि पहले अपने घर को सँभालो, बाद में विदेशों में प्रचार करना। पर मैं तुम लोगों से स्पष्ट शब्दों में कह देता हूँ कि तुम सब से अच्छा काम तभी करते हो, जब दूसरे के लिए काम करते हो। अपने लिए सब से अच्छा काम तुमने तभी किया, जब कि तुमने औरों के लिए काम किया। अपने विचारों का समुद्रों के उस पार विदेशी भाषाओं में प्रचार करने का प्रयत्न किया। और यह सभा ही इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारा अन्यान्य देशों को अपने विचारों से शिक्षित करने का प्रयत्न तुम्हारे अपने देश को भी लाभ पहुँचा रहा है। यदि मैं अपने विचारों को भारत ही में सीमाबद्ध रखता, तो उस प्रभाव का एक चौथाई भी न हो पाता, जो कि मेरे इंग्लैण्ड और अमेरिका जाने से इस देश में हुआ। हमारे सामने यही एक महान् आदर्श है, और हर एक को इसके लिए तैयार रहना चाहिए – वह आदर्श है भारत की विश्व पर विजय – इससे छोटा कोई आदर्श नही चलेगा और हम सभी को इसके लिए तैयार होना चाहिए और भरसक कोशिश करनी चाहिए। अगर विदेशी आकर इस देश को अपनी सेनाओं से प्लावित कर दे तो कुछ परवाह नहीं। उठो भारत, तुम अपनी आध्यात्मिकता द्वारा जगत् पर विजय प्राप्त करो! जैसा कि इसी देश में पहले पहले प्रचार किया गया है, प्रेम ही घृणा पर विजय प्राप्त करेगा, घृणा घृणा को नहीं जीत सकती, हमें भी वैसा ही करना पड़ेगा। भौतिकवाद और उससे उत्पन्न क्लेश भौतिकवाद से कभी दूर नहीं हो सकते। जब एक सेना दूसरी सेना पर विजय प्राप्त करने की चेष्टा करती है तो वह मानवजाति को पशु बना देती है, और इस प्रकार वह पशुओं की संख्या बढ़ा देती है। आध्यात्मिकता पाश्चात्य देशों पर अवश्य विजय प्राप्त करेगी। धीरे धीरे पाश्चात्यवासी यह अनुभव कर रहे हैं कि उन्हें राष्ट्र के रूप में बने रहने के लिए आध्यात्मिकता की आवश्यकता है। वे इसकी प्रतीक्षा कर रहे हैं; चाव से इसकी बाट जोह रहे हैं। उसकी पूर्ति कहाँ से होगी? वे आदमी कहाँ है, जो भारतीय महर्षियों का उपदेश जगत् के सब देशों में पहुँचाने के लिए तैयार हो? कहाँ है वे लोग, जो इसलिए सब कुछ छोड़ने को तैयार हों कि ये कल्याणकर उपदेश संसार के कोने कोने तक फैल जाएँ? सत्य के प्रचार के लिए ऐसे ही वीरहृदय लोगों की आवश्यकता है। वेदान्त के महासत्यों को फैलाने के लिए ऐसे वीर कर्मियों को बाहर जाना चाहिए। जगत् को इसकी चाहना है, इसके बिना जगत् विनष्ट हो जाएगा। सारा पाश्चात्य जगत् मानो एक ज्वालामुखी पर स्थित है, जो कल ही फुटकर उसे चूर चूर कर सकता है। उन्होंने सारी दुनिया छान डाली, पर उन्हें तनिक भी शान्ति नहीं मिली। उन्होंने इन्द्रियसुख का प्याला पीकर खाली कर डाला, पर फिर भी उससे उन्हें तृप्ति नहीं मिली। भारत के धार्मिक विचारों को पाश्चात्य देशों की नस नस में भर देने का यही समय है। इसलिए मद्रासी नवयुवकों, में विशेषकर तुम्हीं को इसे याद रखने को कहता हूँ। हमें बाहर जाना ही पड़ेगा, अपनी आध्यात्मिकता तथा दार्शनिकता से हमें जगत् को जीतना होगा। दूसरा कोई उपाय ही नहीं है, अवश्यमेव इसे करो, या मरो। राष्ट्रीय जीवन, सतेज और प्रबुद्ध राष्ट्रीय जीवन के लिए बस यही एक शर्त है कि भारतीय विचार विश्व पर विजय प्राप्त करे।

साथ ही हमें न भूलना चाहिए कि आध्यात्मिक विचारों की विश्वविजय से मेरा मतलब है उन सिद्धान्तों के प्रचार से, जिनसे जीवनसंचार हो, न कि उन सैकड़ों, अन्धविश्वासों से, जिन्हें हम सदियों से अपनी छाती से लगाते आये हैं। इनको तो इस भारतभूमि से भी उखाड़कर दूर फेंक देना चाहिए, जिससे वे सदा के लिए नष्ट हो जाएँ। इस जाति के अधःपतन के ये ही कारण हैं और ये दिमाग को कमजोर बना देते हैं। हमें उस दिमाग से बचना चाहिए, जो उच्च और महान् चिन्तन नहीं कर सकता, जो निस्तेज होकर मौलिक चिन्तन की सारी शक्तियाँ खो बैठता है, और जो धर्म के नाम पर चले आनेवाले सब प्रकार के छोटे छोटे अन्धविश्वासों के विष से अपने को जर्जरित कर रहा है। हमारी दृष्टि में भारत के लिए कई आपदाएँ खड़ी है। इनमें से ये दो बहुत ही खतरनाक है – घोर भौतिकवाद और उसकी प्रतिक्रिया से पैदा हुआ घोर अन्धविश्वास। इनसे अवश्य बचना चाहिए। आज हमें एक तरफ वह मनुष्य दिखाई पड़ता है, जो पाश्चात्य ज्ञानरूपी मदिरा-पान से मत्त होकर अपने को सर्वज्ञ समझता है। वह प्राचीन ऋषियों की हँसी उड़ाया करता है। उसके लिए हिन्दुओं के सब विचार बिल्कुल वाहियात चीज है, हिन्दु दर्शनशास्त्र बच्चों का कलरव मात्र है और हिन्दू धर्म मूर्कों का मात्र अन्धविश्वास। दूसरी तरफ वह आदमी है, जो शिक्षित तो है, पर जिस पर किसी एक चीज की सनक सवार है और वह उल्टी राह लेकर हर एक छोटीसी बात का अलौकिक अर्थ निकालने की कोशिश करता है। अपनी विशेष जाति या देव-देवियों या गाँव से सम्बन्ध रखनेवाले जितने अन्धविश्वास हैं, उनको उचित सिद्ध करने के लिए दार्शनिक, आध्यात्मिक तथा बच्चों को सुहानेवाले न जाने क्या क्या अर्थ उसके पास सर्वदा ही मौजूद हैं। उसके लिए प्रत्येक ग्राम्य अन्धविश्वास वेदों की आज्ञा है और उसकी समझ में उसे कार्यरूप में परिणत करने पर ही जातीय जीवन निर्भर है। तुम्हें इन सब से बचना चाहिए।

तुममें से प्रत्येक मनुष्य अन्धविश्वासपूर्ण मूर्ख होने के बदले यदि घोर नास्तिक भी हो जाए तो मुझे पसन्द है, क्योंकि नास्तिक तो जीवन्त है, तुम उसे किसी तरह परिवर्तित कर सकते हो। परन्तु यदि अन्धविश्वास घुस जाएँ, तो मस्तिष्क बिगड़ जाएगा, कमजोर हो जाएगा और मनुष्य विनाश की ओर अग्रसर होने लगेगा। तो इन दो संकटों से बचो। हमें निर्भीक साहसी मनुष्यों का ही प्रयोजन है। हमें खून में तेजी और स्नायुओं में बल की आवश्यकता है – लोहे के पुट्ठे और फौलाद के स्नायु चाहिए, न कि दुर्बलता लानेवाले वाहियात विचार। इन सब को त्याग दो, सब प्रकार के रहस्यों से बचो। धर्म में कोई लुकाछिपी नहीं है। क्या वेदान्त, वेद, संहिता अथवा पुराण में कोई ऐसी रहस्य की बातें है? प्राचीन ऋषियों ने अपने धर्मप्रचार के लिए कौनसी गोपनीय समितियाँ स्थापित की थी? क्या ऐसा कोई लेखा है कि अपने महान् सत्यों को मानवजाति में प्रचारित करने के लिए उन्होंने ऐसे ऐसे जादूगरों के से हथकण्डों का उपयोग किया था। हर बात को रहस्यमय बनाना और अन्धविश्वास – ये सदा दुर्बलता के ही चिह्न होते हैं। ये अवनति और मृत्यु के ही चिह्न है। इसलिए उनसे बचे रहो, बलवान् बनो और अपने पैरों पर खड़े हो जाओ। संसार में अनेक अद्भुत एवं आश्चर्यजनक वस्तुएँ है। प्रकृति के बारे में आज हमारी जो धारणाएँ है, उनकी तुलना में हम उन्हें अतिप्राकृतिक कह सकते हैं, परन्तु उनमें से एक भी रहस्यमय नहीं है। इस भारतभूमि पर यह कभी प्रचारित नहीं हुआ कि धर्म के सत्य गोपनीय विषय है, अथवा यह कि वे हिमालय की बर्फिली चोटियों पर बसनेवाली गुप्त समितियों की ही विशेष सम्पत्ति है। मैं हिमालय में गया था, तुम लोग वहाँ पर नहीं गये होगे, वह स्थान तुम्हारे घरों से कई सौ मील दूर है। मैं संन्यासी हूँ और गत चौदह वर्षों से मैं पैदल घूम रहा हूँ। ये गुप्त समितियाँ कहीं भी नहीं है। इन अन्धविश्वासों के पीछे मत दौड़ो। तुम्हारे और जाति के लिए बेहतर होगा कि तुम घोर नास्तिक बन जाओ – क्योंकि कम से कम उससे तुम्हारा कुछ बल बना रहेगा, पर इस प्रकार अन्धविश्वासपूर्ण होना तो अवनति तथा मृत्यु है। मानवजाति को धिक्कार है कि शक्तिशाली लोग इन अन्धविश्वासों पर अपना समय गँवा रहे हैं, दुनिया के सड़े से सड़े अन्धविश्वासों की व्याख्या के लिए रूपकों के आविष्कार करने में अपना सारा समय नष्ट कर रहे हैं। साहसी बनो, सब विषयों की उस तरह व्याख्या करने की कोशिश मत करो। बात यह है कि हममें बहुतेरे अन्धविश्वास है, हमारी देह पर बहुतसे बुरे धब्बे तथा घाव है – इनको काट और चीर-फाड़कर एकदम निकाल देना होगा – नष्ट कर देना होगा। इनके नष्ट होने से हमारा धर्म, हमारा जातीय जीवन, हमारी आध्यात्मिकता नष्ट नहीं होगी। प्रत्येक धर्म का मूलतत्त्व सुरक्षित है और जितनी जल्दी ये धब्बे मिटाये जाएँगे, उतने ही अधिक ये मूलतत्त्व चमकेंगे। इन्हीं पर डटे रहो।

तुम लोग सुनते हो कि हर एक धर्म जगत् का सार्वभौम धर्म होने का दावा करता है। मैं तुमसे पहले ही कह देता हूँ कि शायद कभी भी ऐसी कोई चीज नहीं हो सकेगी, पर यदि कोई धर्म यह दावा कर सके तो वह तुम्हारा ही धर्म है – दूसरा कोई नहीं, क्योंकि दूसरा हर एक धर्म किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के समूह पर निर्भर है। अन्यान्य सभी धर्म किन्हीं व्यक्तियों के जीवन पर अवलम्बित होकर बने हैं, जिन्हें उनके अनुयायी ऐतिहासिक पुरुष समझते हैं, और जिसको वे धर्म की शक्ति समझते हैं, वह वास्तव में उनकी निर्बलता है, क्योंकि यदि इन पुरुषों की ऐतिहासिकता का खण्डन किया जाए तो उनके धर्मरूपी प्रासाद गिरकर धूलि में मिल जाएँगे। इन महान धर्मसंस्थापकों के जीवनचरित्रों में से आधा अंश तो उड़ा दिया गया है और बाकी आधे के विषय में घोर सन्देह उपस्थित किया गया है। अतएव हर एक सत्य, जिसकी प्रामाणिकता इन्हीं के शब्दों पर निर्भर थी, हवा में मिला जा रहा है। पर हमारे धर्म के सत्य किसी व्यक्तिविशेष पर निर्भर नहीं है, यद्यपि हमारे धर्म में महापुरुषों की संख्या पर्याप्त है। कृष्ण की महिमा यह नहीं है कि वे कृष्ण थे, पर यह कि वे वेदान्त के महान् आचार्य थे। यदि ऐसा न होता तो उनका नाम भी भारत से उसी तरह उठ जाता जैसे कि बुद्ध का नाम उठ गया है।

अतः चिरकाल से हमारी निष्ठा धर्म के तत्त्वों के प्रति ही रही है, न कि व्यक्तियों के प्रति। व्यक्ति केवल तत्त्वों के प्रकट रूप है – उनके उदाहरणस्वरूप है। यदि तत्त्व बने रहे तो व्यक्ति एक नहीं, हजारों और लाखों की संख्या में पैदा होंगे। यदि तत्त्व बचा रहा तो बुद्ध जैसे सैकड़ों और हजारों पुरुष पैदा होंगे, परन्तु यदि तत्त्व का नाश हुआ और वह भुला दिया गया एवं सारी जाति का जीवन तथाकथित ऐतिहासिक व्यक्ति पर ही निर्भर रहने में प्रयत्नशील रहा, तो उस धर्म के सामने आपदाएँ और खतरे हैं। हमारा धर्म ही एकमात्र ऐसा है, जो किसी व्यक्ति या व्यक्तियों पर निर्भर नहीं, वह तत्त्वों पर प्रतिष्ठित है। पर साथ ही इसमें लाखों के लिए स्थान है। नये लोगों को स्थान देने के लिए उसमें काफी गुंजाइश है, पर उनमें से प्रत्येक को उन तत्त्वों का एक उदाहरणस्वरूप होना चाहिए। हमें यह न भूलना चाहिए। हमारे धर्म के ये तत्त्व अब तक सुरक्षित हैं, और हममें से प्रत्येक का जीवनव्रत यही होना चाहिए कि हम उन्हीं की रक्षा करें, उन्हें युग-युगान्तर से जमा होने वाले मैल और गर्द से बचाएँ। यह एक अद्भुत घटना है कि हमारी जाति के बारम्बार अवनति के गर्त में गिरने पर भी, वेदान्त के ये तत्त्व कभी मलिन नहीं हुए। किसी ने, वह कितना ही दुष्ट क्यों न हो, उन्हें दूषित करने का साहस नहीं किया। संसार भर में अन्य सब शास्त्रों की अपेक्षा हमारे शास्त्र सर्वाधिक सुरक्षित रहे हैं। अन्यान्य शास्त्रों की तुलना में इसमें कोई भी प्रक्षिप्त अंश नहीं घुस पाया है, पाठों की तोड़मरोड़ नहीं हुई है, उनके विचारों का सारभाग नष्ट नहीं हो पाया है। वह ज्यों का त्यों बना रहा है और मानव-मन को आदर्श लक्ष्य की ओर परिचालित करता रहा है।

तुम देखते हो कि इन ग्रन्थों के भाष्य भिन्न भिन्न भाष्यकारों ने किये, उनका प्रचार बड़े बड़े आचार्यों ने किया, और उन्हीं पर सम्प्रदायों की नींव डाली गयी, और तुम देखते हो कि इन वेदग्रन्थों में ऐसे अनेक तत्त्व हैं, जो आपाततः परस्परविरोधी प्रतीत होते हैं। कुछ ऐसे पाठांश हैं, जो सम्पूर्ण द्वैतभाव के हैं और कितने ही बिल्कुल अद्वैतभाव के। द्वैतवाद के भाष्यकार द्वैतवाद छोड़कर और कुछ समझ नहीं पाते, अतएव वे अद्वैतवाद के पाठांशों पर बुरी तरह वार करने कि कोशिश करते हैं। सभी द्वैतवादी धर्माचार्य तथा पुरोहितगण उन्हें द्वैतात्मक अर्थ देना चाहते हैं। अद्वैतवाद के भाष्यकार द्वैतवाद के सूत्रों की वही दशा करते हैं। परन्तु यह वेदों का दोष नहीं। यह प्रमाणित करने की चेष्टा करना कोरी मूर्खता है कि सम्पूर्ण वेद द्वैतभावात्मक हैं। उसी प्रकार समग्र वेदों को अद्वैतभावसमर्थन प्रमाणित करने की चेष्टा भी निरी मूर्खता है। वेदों में द्वैतवाद अद्वैतवाद दोनों ही है। आजकल के नये भावों के प्रकाश में हम उन्हें पहले से कुछ अच्छी तरह समझ सकते हैं। ये विभिन्न धारणाएँ जिनकी गति द्वैतवाद और अद्वैतवाद दोनों ओर है, मन की क्रमोन्नति के लिए आवश्यक हैं, और इसी कारण वेद उनका प्रचार करते हैं। समग्र मनुष्यजाति पर कृपा करके वेद उच्चतम लक्ष्य के भिन्न भिन्न सोपानों का निर्देश करते हैं। यह नहीं कि वे एक दूसरे के विरोधी हों। बच्चे जैसे अबोध मनुष्यों को मोहने के लिए वेदों ने वृथा वाक्यों का प्रयोग नहीं किया है। उनकी जरूरत है और वह केवल बच्चों के लिए नहीं, वरन् प्रौढ़ बुद्धिवालों के लिए भी जब तक शरीर है और जब तक हम इस शरीर से ही अपनी तद्रूपता स्थापित करने के विभ्रम में पड़े रहेंगे, जब तक हमारी पाँच इन्द्रियाँ हैं और जब तक हम इस स्थूल जगत् को देखते हैं, हमारे लिए व्यक्तिविशेष ईश्वर या सगुण ईश्वर आवश्यक है। यदि हमारे ये सभी भाव हैं, तो जैसा कि महामनीषी रामानुज ने प्रमाणित किया है, हमको ईश्वर, जीव और जगत् इनमें से एक को स्वीकार करने पर शेष सब को स्वीकार करना ही पड़ेगा। अतएव जब तक हम बाहरी संसार देख रहे हैं, तब तक सगुण ईश्वर और जीवात्मा को स्वीकार न करना निरा पागलपन है। परन्तु महापुरुषों के जीवन में वह समय आ सकता है, जब जीवात्मा अपने सब बन्धनों से अतीत होकर, प्रकृति के परे, उस सर्वातीत प्रदेश में चला जाता है, जिसके बारे में श्रुति कहती है :

यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह।4
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः।5
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च।6

‘मन के साथ वाणी जिसे न पाकर लौट आती है।’ ‘वहाँ न नेत्र पहुँचते हैं, न वाक्य, न मन।’ ‘मैं उसे जानता हूँ, न यही कह सकता हूँ, और नहीं जानता, न यही।’ तभी जीवात्मा सारे बन्धनों को पार कर जाता है। तभी, केवल तभी उसके हृदय में अद्वैतवाद का यह मूलतत्त्व प्रकाशित होता है कि समस्त संसार और मैं एक हूँ, मैं और ब्रह्म एक हूँ। और तुम देखोगे कि यह सिद्धान्त न केवल शुद्ध ज्ञान और दर्शन ही से प्राप्त हुआ है, किन्तु प्रेम के द्वारा भी उसकी कुछ झलक पायी गयी है। तुमने भागवत में पढ़ा होगा कि जब श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये और गोपियाँ उनके वियोग से विकल हो गयीं, तो अन्त तक श्रीकृष्ण की भावना का गोपियों के चित्त पर इतना प्रभाव पड़ा कि हर एक गोपी अपनी देह को भूल गयी और सोचने लगी कि वही श्रीकृष्ण है, और अपने को उसी तरह सज्जित करके क्रीड़ा करने लगी, जिस तरह श्रीकृष्ण करते थे। अतएव हमने यह समझ लिया कि यह एकत्व का अनुभव प्रेम से भी होता है। फारस के एक पुराने सूफी कवि अपनी एक कविता में कहते हैं – “मैं अपने प्यारे के पास गया और देखा तो द्वार बन्द था। मैंने दरवाजे पर धक्का लगाया तो भीतर से आवाज आयी, ‘कौन है?’ मैंने उत्तर दिया, ‘मैं हूँ।’ द्वार न खुला। मैंने दूसरी बार आकर दरवाजा खटखटाया तो उसी स्वर ने फिर पूछा कि कौन है। मैंने उत्तर दिया, ‘मैं अमुक हूँ।’ फिर भी द्वार न खुला। तीसरी बार मैं गया और वही ध्वनि हुई, ‘कौन है?’ मैंने कहा, ‘मैं तुम हूँ, मेरे प्यारे।’ और द्वार खुल गया।”

अतएव हमें समझना चाहिए कि ब्रह्मप्राप्ति के अनेक सोपान है और यद्यपि पुराने भाष्यकारों में, जिन्हें हमें श्रद्धा की दृष्टि से देखना चाहिए, एक दूसरे से विवाद होता रहा, हमें विवाद नहीं करना चाहिए; क्योंकि ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। क्या प्राचीन काल में, क्या वर्तमान समय में सर्वज्ञत्व पर किसी एक का सर्वाधिकार नहीं है! यदि अतीत काल में अनेक ऋषि, महापुरुष हो गये हैं, तो निश्चय जानो की वर्तमान समय में भी अनेक होंगे। यदि व्यास, वाल्मीकि और शंकराचार्य आदि पुराने जमाने में हो गये हैं तो क्या कारण है कि अब भी तुममें हर एक शंकराचार्य न हो सकेगा? हमारे धर्म में एक विशेषता और है, जिसे तुम्हें याद रखना चाहिए। अन्यान्य शास्त्रों में भी ईश्वरी प्रेरणा को प्रमाणस्वरूप बतलाया जाता है। परन्तु इन प्रेरितों की संख्या उनके मत में एक, दो अथवा बहुत ही अल्प व्यक्तियों तक सीमित है। उन्हीं के माध्यम से सर्वसाधारण जनता में इस सत्य का प्रचार हुआ, और हम सभी को उनकी बात माननी ही पड़ेगी। नाजरथ के ईसा में सत्य का प्रकाश हुआ था, और हम सभी को उसे मान लेना होगा। भारत के मन्त्रद्रष्टा ऋषियों के हृदय में सत्य का आविर्भाव हुआ था और भविष्य में भी सभी ऋषियों में उस सत्य का आविर्भाव होगा, किन्तु वह न बातूनियों में होगा, न पुस्तकें चाट जानेवालों में, न बड़े विद्वानों में, न भाषावेत्ताओं में, वह केवल तत्त्वदर्शियों में ही सम्भव है।

‘आत्मा ज्यादा बातें गढ़ने से नहीं प्राप्त होती, न वह बड़ी बुद्धिमत्ता से ही सुलभ है और न वह वेदों के पठन से ही मिल सकती है।’7 वेद स्वयं यह बात कहते हैं। क्या तुम किन्हीं दूसरे शास्त्रों में इस प्रकार की निर्भीक वाणी पाते हो कि शास्त्रपाठ द्वारा भी आत्मा की प्राप्ति नहीं हो सकती? तुम्हारे लिए हृदय को मुक्त करना आवश्यक है। धर्म का अर्थ न गिरजे में जाना है, न ललाट रँगना है, न विचित्र ढंग का भेष धरना है। इन्द्रधनुष के सब रंगों से तुम अपने को चाहे भले ही रँग लो, किन्तु यदि तुम्हारा हृदय उन्मुक्त्त नहीं हुआ है, यदि तुमने ईश्वर का साक्षात्कार नहीं किया है, तब यह सब व्यर्थ है। जिसने हृदय को रँग लिया है, उसके लिए दूसरे रंग की आवश्यकता नहीं। यही धर्म का सच्चा अनुभव है। परन्तु हमें यह न भूलना चाहिए कि रंग और रूप कही गयी कुल बातें अच्छी तब तक मानी जा सकती है, जब तक वे हमें धर्ममार्ग में सहायता दें। तभी तक उनका स्वागत करना चाहिए। परन्तु वे हमें प्रायः अधःपतित कर देती है और सहायता की जगह विघ्न ही खड़ा करती हैं, क्योंकि इन्हीं बाह्योपचारों को मनुष्य धर्म समझ लेता है। फिर मन्दिर को जाना ही आध्यात्मिक जीवन और पुरोहित को कुछ देना ही धर्मजीवन माना जाने लगता है। ये बातें बड़ी भयानक और हानिकारक है, इन्हें दूर करना चाहिए। हमारे शास्त्रों में बार बार कहा गया है कि बहिरिन्द्रियों के ज्ञान के द्वारा धर्म कभी प्राप्त नहीं हो सकता। धर्म वही है, जो हमें उस अक्षर पुरुष का साक्षात्कार कराता है, और हर एक के लिए धर्म यही है। जिसने इस इन्द्रियातीत सत्ता का साक्षात्कार कर लिया, जिसने आत्मा का स्वरूप उपलब्ध कर लिया, जिसने भगवान् को प्रत्यक्ष देखा – हर वस्तु में देखा, वही ऋषि हो गया। और तब तक तुम्हारा जीवन धर्मजीवन नहीं, जब तक तुम ऋषि नहीं हो जाते। तभी तुम्हारे यथार्थ धर्म का आरम्भ होगा और अभी तो ये सब तैयारियाँ ही हैं। तभी तुम्हारे भीतर धर्म का प्रकाश फैलेगा, अभी तो तुम केवल मानसिक व्यायाम कर रहे हो और शारीरिक कष्ट झेल रहे हो।

अतएव हमें अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि हमारा धर्म स्पष्ट रूप से यह कह रहा है कि जो कोई मुक्तिप्राप्ति की इच्छा रखे, उसे ही इस ऋषित्व का लाभ करना होगा, मन्त्रद्रष्टा होना होगा, ईश्वरसाक्षात्कार करना होगा। यही मुक्ति है और यही हमारे शास्त्रों के द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त। इसके बाद अपने शास्त्रों का अपने आप अवलोकन करना आसान हो जाता है, हम स्वयं ही अपने शास्त्रों का अर्थ समझ सकते हैं। उनमें से हमारे लिए जितना आवश्यक है, उतना ग्रहण कर सकते हैं तथा स्वयं ही सत्य को समझ सकते हैं। साथ ही हमें उन प्राचीन ऋषियों के प्रति, उनके कार्य के लिए, पूर्ण सम्मान प्रदर्शित करना चाहिए। वे प्राचीन ऋषिगण महान् थे, परन्तु हमें और भी महान् होना है। अतीत काल में उन्होंने बड़े बड़े काम किये, परन्तु हमें उनसे भी बड़ा काम कर दिखाना है। प्राचीन भारत में सैकड़ों ऋषि थे, और अब हमारे बीच लाखों होंगे – निश्चय ही होंगे। इस बात पर तुममें से हर एक जितनी जल्दी विश्वास करेगा, भारत का और समग्र संसार का उतना ही अधिक हित होगा। तुम जो कुछ विश्वास करोगे, तुम वही हो जाओगे। यदि तुम अपने को महापुरुष समझोगे तो कल ही तुम महापुरुष हो जाओगे। तुम्हें रोक दे, ऐसी कोई चीज नहीं है। आपातविरोधी सम्प्रदायों के बीच यदि कोई साधारण मत है, तो वह यही है कि आत्मा में पहले से ही महिमा, तेज और पवित्रता वर्तमान हैं। केवल रामानुज के मत में आत्मा कभी कभी संकुचित हो जाती है और कभी कभी विकसित, परन्तु शंकराचार्य के मतानुसार संकोच-विकास भ्रम मात्र है। इस मतभेद पर ध्यान मत दो। सभी तो यह स्वीकार करते हैं कि व्यक्त या अव्यक्त चाहे जिस भाव में रहे, वह शक्ति है जरूर। और जितनी शीघ्रता से उस पर विश्वास कर सकोगे, उतना ही तुम्हारा कल्याण होगा। समस्त शक्ति तुम्हारे भीतर है, तुम कुछ भी कर सकते हो और सब कुछ कर सकते हो, यह विश्वास करो। मत विश्वास करो कि तुम दुर्बल हो। आजकल हममें से अधिकांश जैसे अपने को अधपागल समझते हैं, तुम अपने को वैसा मत समझो। इतना ही नहीं, तुम कोई भी काम बिना किसी की सहायता के ही कर सकते हो। तुममे सब शक्ति है। तत्पर हो जाओ। तुममें जो देवत्व छिपा हुआ है, उसे प्रकट करो।


  1. श्रद्धानो शुभां विद्यामाददीतावरादपि।
    अन्त्यादपि परं धर्म स्त्रीरत्न दुष्कुलादपि॥
  2. कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन॥ गीता २।४७॥
  3. सुमात्रा, जावा, बोर्नियो आदि।
  4. तैत्तिरीयोपनिषद् २।९॥
  5. केनोपनिषद् १।३॥
  6. कठोपनिषद् २।२॥
  7. नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। . . . कठोपनिषद् १।२।२३॥

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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