स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखित (2 नवम्बर, 1893)

(स्वामी विवेकानंद का श्री आलासिंगा पेरुमल को लिखा गया पत्र)

शिकागो,
२ नवम्बर, १८९३

प्रिय आलासिंगा,

कल तुम्हारा पत्र मिला। मुझे खेद है कि मेरी एक क्षणिक कमजोरी के कारण तुम्हें इतना कष्ट हुआ। उस समय मैं खर्चे से तंग था। उसके बाद प्रभु की प्रेरणा से मुझे बहुत से मित्र मिल गये। बोस्टन के निकट एक गाँव में हार्वर्ड विश्व-विद्यालय के यूनानी भाषा के प्रोफेसर डॉ. राइट से मेरी जान-पहचान हो गयी। उन्होंने मेरे प्रति बहुत सहानुभूति दिखायी और इस बात पर जोर दिया कि मैं धर्म-महासभा में अवश्य जाऊँ, क्योंकि उनके विचार से उसके द्वारा मेरा परिचय सम्पूर्ण अमेरिका से हो जायेगा। चूँकि वहाँ किसीसे मेरी जान-पहचान न थी इसलिए प्रोफेसर साहब ने मेरे लिए सब बन्दोबस्त करने का भार अपने ऊपर लिया और उसके बाद मैं फिर शिकागो आ गया। यहाँ धर्म-महासभा में आये हुए पूर्वी और पश्चिमी देशों के प्रतिनिधियों के साथ एक सज्जन के मकान में मेरे ठहरने की व्यवस्था हो गयी है।

महासभा के उद्घाटन के दिन सुबह हम लोग ‘आर्ट पैलेस’ नामक एक भवन में एकत्र हुए, जहाँ एक बड़ा और कुछ छोटे-छोटे हॉल सभा के अधिवेशनों के लिए अस्थायी रूप से निर्मित किये गये थे। सभी राष्ट्रों के लोग वहाँ थे। भारत से ब्राह्म समाज के प्रतापचन्द्र मजूमदार थे, बम्बई से नगरकर, जैन धर्म के प्रतिनिधि वीरचन्द गाँधी थे, थियोसॉफी के प्रतिनिधि श्रीमती एनी बेसेन्ट तथा चक्रवर्ती थे। इन सबमें मजूमदार मेरे पुराने मित्र थे और चक्रवर्ती मेरे नाम से परिचित थे। शानदार जुलूस के बाद हम सब लोग मंच पर बैठाये गये। कल्पना करो, नीचे एक बड़ा हॉल और ऊपर एक बहुत बड़ी गैलरी, दोनों में छः-सात हजार स्री-पुरुष जो इस देश की सर्वोत्कृष्ट संस्कृति के प्रतिनिधि हैं, खचाखच भरे हैं तथा मंच पर संसार की सभी जातियों के बड़े-बड़े विद्वान् एकत्र हैं। और मुझे, जिसने अब तक कभी किसी सार्वजनिक सभा में भाषण नहीं दिया, इस विराट् जन-समुदाय के समक्ष भाषण देना होगा!! उसका उद्घाटन बड़े समारोह से संगीत और भाषणों द्वारा हुआ। तदुपरान्त आये हुए प्रतिनिधियों का एक एक करके परिचय दिया गया और वे सामने आ-आकर अपना भाषण देने लगे। निःसन्देह मेरा ह्य्दय धड़क रहा था और जबान प्रायः सूख गयी थी। मैं इतना घबड़ाया हुआ था कि सबेरे बोलने की हिम्मत न हुई। मजूमदार की वक्तृता सुन्दर रही। चक्रवर्ती की तो उससे भी सुन्दर। दोनों के भाषणों के समय खूब करतल-ध्वनि हुई। वे सब अपने-अपने भाषण तैयार करके आये थे। मैं अबोध था और बिना किसी प्रकार की तैयारी के था। किन्तु मैं देवी सरस्वती को प्रणाम करके सामने आया और डॉ. बरोज ने मेरा परिचय दिया। मैंने एक छोटा-सा भाषण दिया। मैंने इस प्रकार सम्बोधन किया, “अमेरिकानिवासी बहनों और भाइयों!” इसके बाद ही दो मिनट तक ऐसी घोर करतल-ध्वनि हुई कि कान में अँगुली देते ही बनी। फिर मैंने आरम्भ किया। और जब अपना भाषण समाप्त कर बैठा, तो भावावेग से मानो मैं अवश हो गया था। दूसरे दिन सब समाचार-पत्रों में छपा कि मेरी ही वक्तृता उस दिन सबसे अधिक सफल थी। पूरा अमेरिका मुझे जान गया। महान् टीकाकार श्रीधर ने ठीक ही कहा है, मूकं करोति वाचालं, अर्थात् जिसकी कृपा मूक को भी धाराप्रवाह वक्ता बना देती है, वह प्रभु धन्य है! उस दिन से मैं विख्यात हो गया और जिस दिन मैंने हिन्दू धर्म पर अपनी वक्तृता पढ़ी, उस दिन तो हॉल में इतनी अधिक भीड़ थी, जितनी पहले कभी न थी यह समाचारपत्र का कुछ अंश उद्धृत करता हूँ – ‘केवल महिलाएँ ही महिलाऍ।, कोने कोने में, जहाँ देखो, वहाँ ठसाठस भरी हुई दिखायी देती थीं। अन्य सब वक्तृताओं के समाप्त होने तक वे किसी प्रकार धैर्य धारण कर विवेकानन्द की वक्तृता की बाट जोहती रहीं’, इत्यादि। तुम्हारे पास यदि मैं समाचारपत्रों की कतरनें भेजूँ, तो तुम आश्चर्यचकित हो जाओगे। परन्तु तुम जानते ही हो कि मैं नाम-यश से घृणा करता हूँ। इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि जब कभी मैं मंच पर आया, तो बहरा कर देने वाली करतल-ध्वनि से मेरा स्वागत किया गया। प्रायः सभी पत्रों ने मेरी प्रशंसा के पुल बाँध दिये और उनमें जो बड़े कट्टर थे, उन्हें भी स्वीकार करना पड़ा कि ‘यह मनुष्य अपनी सुन्दर आकृति, आकर्षक व्यक्तित्व और आश्चर्यजनक वक्तृत्व के कारण सम्मेलन में सबसे प्रमुख व्यक्ति है’ – इत्यादि, इत्यादि। तुम्हें इतना ही जान लेना पर्याप्त होगा कि किसी प्राच्य व्यक्ति ने अमेरिका समाज पर इतना गहरा प्रभाव इसके पूर्व कभी नहीं डाला।

अमेरिकावासियों की दया का बखान मैं कैसे करूँ? मुझे अब किसी वस्तु का अभाव नहीं। मैं बहुत अच्छी तरह हूँ। यूरोप जाने के लिए आवश्यक धन मुझे यहाँ से मिल जयेगा। इसलिए तुम लोगों को कष्ट सहन कर रुपये भेजने की आवश्यकता नहीं। एक बात पूछनी है – क्या तुम लोगों ने ८०० रुपये एक ही साथ भेजे थे? कुक कम्पनी से मुझे केवल ३० पौंड ही मिले हैं। तुमने और महाराज ने अगर अलग अलग रुपये भेजे हैं, तो अभी तक कुछ रकम मुझे नहीं मिली है। यदि एक साथ ही भेजे हैं, तो एक बार पूछ-ताछ करना। नरसिंहाचार्य नाम का एक युवक हमारे बीच आ उपस्थित हुआ है। पिछले तीन सालों से वह इस शहर में इधर-उधर घूमता रहा। घूमता रहा हो या न हो, वह मुझे अच्छा लगता है। पर यदि तुम उसे जानते हो, तो उसका पूर्व वृत्तान्त विस्तार के साथ लिखो। वह तुमको जानता है। जिस वर्ष पेरिस में प्रदर्शनी हुई थी, उस वर्ष वह यूरोप आया।…

मुझे अब कुछ भी अभाव नहीं रहा। शहर के कई अच्छे से अच्छे घरों में मेरा प्रवेश हो गया है। मैं सदैव किसी न किसी का अतिथि होकर रहता हूँ। जैसी जिज्ञासा इस देश के लोगों में है, वैसी अन्यत्र नहीं। प्रत्येक वस्तु का ज्ञान प्राप्त करना इन्हें सदैव अभीष्ट रहता है और इनकी महिलाएँ तो संसार में सबसे अधिक उन्नत हैं। सामान्यतः अमेरिकी पुरुषों की अपेक्षा अमेरिकी महिलाएँ बहुत अधिक सुसंस्कृत हैं। पुरुष तो धन कमाने के लिए आजीवन दासत्व की शृंखला में बँधे रहते हैं, परन्तु नारियाँ अपनी उन्नति के प्रत्येक अवसर से लाभ उठाती हैं। ये लोग बड़े दयालुह्य्दय और स्पष्टवादी हैं। जिस किसी को अपने किसी सनक का प्रचार करना होता है, वह यहाँ चला आता है और मुझे खेद है कि इनमें से बहुतेरे अधकचरे निकलते हैं। अमेरिकनों में दोष भी हैं और दोष किस जाति में नहीं हैं? परन्तु मेरा निष्कर्ष यह है – एशिया ने सभ्यता की नींव डाली, यूरोप ने पुरुषों की उन्नति की, और अमेरिका महिलाओं और जनसाधारण की उन्नति कर रहा है। यह महिलाओं और श्रमजीवियों का स्वर्ग है। अब अमेरिकी लोक-समाज तथा नारियों की तुलना अपने देश के लोगों से करो – भेद तुरन्त स्पष्ट हो जायेगा। अमेरिकी लोग द्रुत गति से उदारमना होते जा रहे हैं। उनकी तुलना उन ‘कट्टर’ (यह उन्हीं का शब्द है) ईसाई मिशनरियों से न करो, जो तुम्हें भारतवर्ष में दिखायी देते हैं। यहाँ भी वैसे लोग हैं, पर उनकी संख्या दिनोदिन तेजी से कम होती जा रही है। और यह महान् राष्ट्र शीघ्रता से उस आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर होता जा रहा है, जिसका हिन्दुओं को गौरवपूर्ण अभिमान है।

हिन्दुओं को अपना धर्म छोड़ने की आवश्यकता नहीं। किन्तु उन्हें चाहिए कि धर्म को एक उचित मर्यादा के भीतर सीमित रखें और समाज को उन्नतिशील होने के लिए स्वाधीनता दे दें। भारत के सभी समाज-सुधारकों ने पुरोहितों के अत्याचारों और अवनति का उत्तरदायित्व धर्म के मत्थे मढ़ने की एक भयंकर भूल की और एक अभेद्य गढ़ को ढहाने का प्रयत्न किया। नतीजा क्या हुआ? असफलता! बुद्धदेव से लेकर राममोहन राय तक सबने जाति-भेद को धर्म का एक अंग माना और जाति-भेद के साथ ही धर्म पर भी पूरा आघात किया और असफल रहे। पुरोहितगण चाहे कुछ भी बकें, वर्ण-व्यवस्था केवल एक सामाजिक विधान ही है, जिसका काम हो चुका, अब तो वह भारतीय वायुमण्डल में दुर्गन्ध फैलाने के अतिरिक्त कुछ नहीं करती। यह तभी हटेगी, जब लोगों को उनका खोया हुआ सामाजिक व्यक्तित्व पुनः प्राप्त हो जायेगा। इस देश में जन्म लेनेवाला प्रत्येक व्यक्ति अपने को एक ‘मनुष्य’ समझता है। भारत में जन्म लेनेवाला प्रत्येक व्यक्ति समझता है कि वह समाज का एक दास है। उन्नति का एकमात्र सहायक स्वाधीनता है। उसके अभाव में अवनति अवश्यम्भावी है। देखो, आधुनिक प्रतिस्पर्धा के युग में जाति-भेद अपने आप कैसे नष्ट होता जा रहा है। उसका नाश करने के लिए किसी धर्म की आवश्यकता नहीं। उत्तर भारत में दूकानदारी, जूतों का धन्धा और शराब बनाने का काम करने वाले ब्राह्मण देखने में आते हैं। इसका कारण? – प्रतिद्वन्दिता। वर्तमान राज-शासन में किसी भी मनुष्य पर इच्छानुसार कोई भी व्यवसाय करने की रोक-टोक नहीं। फलतः जबरदस्त प्रतियोगिता उत्पन्न हो गयी है। इस प्रकार हजारों लोग नीचे पड़े रहकर जड़ता प्राप्त होने की जगह उन ऊँचे से ऊँचे पदों को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील हैं और प्राप्त भी कर रहे हैं, जिनके लिए उन्होंने जन्म ग्रहण किया है।

कम से कम जाड़े भर मुझे इस देश में रहना ही है। फिर यूरोप जाऊँगा। मेरे लिए प्रभु सब प्रबन्ध कर देंगे। तुम उसकी चिन्ता न करो। तुम्हारे प्रेम के लिए कृतज्ञता प्रकट करना मेरे लिए असम्भव है।

प्रतिदिन मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रभु मेरे साथ हैं और मैं उनके आदेशानुसार चल रहा हूँ। उनकी इच्छा पूर्ण हो।… हम लोग संसार के लिए बड़े महत्वपूर्ण कार्य करेंगे और वे सब निःस्वार्थ भाव से किए जायेंगे, नाम अथवा यश के लिए नहीं।

प्रश्न करने का हमें कोई अधिकार नहीं; हमें तो अपना कार्य करते करते प्राण छोड़ने हैं (Ours not to reason why, ours but to do and die) ; साहस रखो और इस बात का विश्वास रखो कि प्रभु ने बड़े-बड़े कार्य करने के लिए हम लोगों को चुना है और हम उन्हें करके ही रहेंगे। उसके लिए तैयार रहो, अर्थात् पवित्र, विशुद्ध एवं निःस्वार्थ – प्रेमसम्पन्न बनो। दरिद्रों, दुःखियों और दलितों से प्रेम करो, प्रभु तुम्हारा कल्याण करेंगे।

रामनाड़ के राजा और अन्य बन्धुओं से प्रायः मिलते रहो और उनसे आग्रह करो कि वे भारत के साधारण लोगों के प्रति सहानुभूति रखें। उन्हें बतलाओ कि वे किस प्रकार गरीबों की गर्दनों पर सवार हैं और यह कि यदि वे प्रजा की उन्नति के लिए प्रयत्न न करें, तो वे मनुष्य कहलाने योग्य नहीं। निर्भय हो जाओ। प्रभु तुम्हारे साथ है और वे भारत के करोड़ों भूखों और अशिक्षितों का उद्धार करेंगे। यहाँ का रेलवे का कुली तुम्हारे यहाँ के बहुत से युवकों और राजाओं से अधिक सुशिक्षित है। जिस शिक्षा की हिन्दू ललनाएँ कल्पना तक न कर सकती होंगी, उससे कहीं अधिक शिक्षा यहाँ प्रत्येक अमेरिकी महिला को प्राप्त है। हमें वैसी शिक्षा क्यों न प्राप्त हो? वह हमारे लिए आवश्यक है।

अपने को निर्धन मत समझो। धन बल नहीं; साधुता एवं पवित्रता ही बल है। आओ, देखो, सारे संसार में यह बात कितनी सही उतरती है।

आशीर्वादक,
विवेकानन्द

पुनश्च – तुम्हारे चाचा का लेख एक अद्भुत चीज थी, जो मेरे देखने में आयी। वह तो एक व्यापारी के चिट्ठे की भाँति थी और वह धर्म-महासभा में पढ़े जाने के योग्य नहीं समझा गया। अतएव नरसिंहाचार्य ने उसमें से कुछ उद्धरण एक ओर के एक हॉल में पढ़ सुनाये और किसी ने उसके एक शब्द का भी अर्थ न समझा। उनसे यह बात न कहना। बहुत सा विचार थोड़े शब्दों में व्यक्त करना एक महती कला है। यहाँ तक कि मणिलाल द्विवेदी के लेख में भी बहुत काटछाँट करनी पड़ी। एक हजार से अधिक निबंध पढ़े गये थे और इस प्रकार के व्यर्थ वाग्जाल के सुनने के लिए समय न था। सबके लिए सामान्यतः जो आधे घण्टे का समय निश्चित था, उससे भी अधिक समय मुझे मिला था, क्योंकि सर्वप्रिय वक्ता आखिर में बोलने के लिए रखे जाते थे, ताकि श्रोतृमण्डली प्रतीक्षा में बैठी रहे। प्रभु उनका कल्याण करें; क्या गजब की सहानुभूति और क्या गजब का धैर्य है उनमें! सुबह दस बजे से लेकर रात के दस बजे तक बैठे रहते थे। बीच में केवल आधे घण्टे का अवकाश भोजन के लिए मिलता था। एक एक करके सभी प्रबन्ध पढ़े गये। उनमें से अधिकांश ही बहुत साधारण थे, पर लोग अपने प्रिय वक्ताओं के लिए धैर्यपूर्वक बाट जोहते रहे।

लंका के धर्मपाल ऐसे ही प्रिय वक्ताओं में से थे। किन्तु दुर्भाग्य से वे सुवक्ता नहीं थे, श्रोताओं के सम्मुख कहने के लिए उनके पास सिर्फ मैक्स मूलर एवं रिस् डेविड्स की कुछ उक्तियाँ ही थीं। किन्तु वे बहुत ही मधुर स्वभाववाले हैं। महासभा की बैठकों के दिनों में हम दोनों में खूब घनिष्ठता हो गयी।

पूना की एक ईसाई महिला कुमारी सोराब जी और जैन प्रतिनिधि श्री गाँधी इस देश में ठहरकर जगह जगह व्याख्यान देंगे। आशा है, वे सफल होंगे। व्याख्यान देना इस देश में एक बड़ा लाभजनक व्यवसाय है और कभी उससे खूब धन भी प्राप्त होता है। श्री इंगरसोल को प्रति व्याख्यान पाँच सौ से लेकर छः सौ डालर तक मिलते हैं। इस देश में वे बड़े प्रसिद्ध वक्ता हैं। इस पत्र को प्रकाशित मत करना। पढ़ने के बाद इसे (खेतड़ी के) महाराजा के पास भेज देना। मैंने उनके पास अमेरिका में लिया गया अपना चित्र भेजा है।

वि.

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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