स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री हरिदास बिहारीदास देसाई को लिखित (15 नवम्बर, 1894)

(स्वामी विवेकानंद का श्री हरिदास बिहारीदास देसाई को लिखा गया पत्र)

शिकागो,
१५ नवम्बर, १८९४

प्रिय दीवानजी साहब,

आपका कृपापत्र मुझे मिला। आपने यहाँ भी मुझे याद रखा, यह आपकी दया है। आपके नारायण हेमचन्द्र से मेरी भेंट नहीं हुई है। मैं समझता हूँ कि वे अमेरिका में नहीं हैं। मैंने कई विचित्र दृश्य और ठाट-बाट की चीजें देखीं। मुझे यह जानकर खुशी हुई कि आपके यूरोप आने की बहुत कुछ सम्भावना है। जिस तरह भी हो सके, उसका लाभ उठाइए। संसार के दूसरे राष्ट्रों में पृथक रहना हमारी अवनति का कारण हुआ एवं पुनः सभी राष्ट्रों से मिलकर संसार के प्रवाह में आ जाना ही उसको दूर करने का एकमात्र उपाय है। गति ही जीवन का लक्षण है। अमेरिका एक शानदार देश है। निर्धनों एवं नारियों के लिए यह नन्दनवनस्वरूप है। इस देश में दरिद्र तो समझिए, कोई है ही नहीं, और कहीं भी संसार में स्त्रियाँ इतनी स्वतन्त्र, इतनी शिक्षित और इतनी सुसंस्कृत नहीं हैं। वे समाज में सब कुछ हैं।

यह एक बड़ी शिक्षा है। संन्यास-जीवन का कोई भी धर्म – यहाँ तक कि अपने रहने का तरीका भी नहीं बदलना पड़ा है। और फिर भी इस अतिथिवत्सल देश में हर घर मेरे लिए खुला है। जिस प्रभु ने भारत में मुझे मार्ग दिखाया, क्या वह मुझे यहाँ मार्ग न दिखाता ? वह तो दिखा ही रहा है!

आप कदाचित् यह न समझ सके होंगे कि अमेरिका में एक संन्यासी के आने का क्या काम, पर यह आवश्यक था। क्योंकि संसार द्वारा मान्यता प्राप्त करने के लिए आप लोगों के पास एक ही साधन है – वह है धर्म, और यह आवश्यक है कि हमारे आदर्श धार्मिक पुरुष विदेशों में भेजे जाएँ, जिससे दूसरे राष्ट्रों को मालूम हो कि भारत अभी भी जीवित है।

प्रतिनिधि रूप से कुछ लोगों को भारत से बाहर सब देशों में जाना चाहिए, कम-से-कम यह दिखलाने को कि आप लोग बर्बर या असभ्य नहीं हैं। भारत में अपने घर में बैठे-बैठे शायद आपको इसकी आवश्यकता न मालूम होती हो, परन्तु विश्वास कीजिए कि आपके राष्ट्र की बहुत-सी बातें इस पर निर्भर हैं। और वह संन्यासी, जिसमें मनुष्यों के कल्याण करने की कोई इच्छा नहीं, वह संन्यासी नहीं, वह तो पशु है!

न तो मैं केवल दृश्य देखने वाला यात्री हूँ, न निरुद्योगी पर्यटन। यदि आप जीवित रहेंगे, तो मेरा कार्य देख पाएँगे और आजीवन मुझे आशीर्वाद देंगे।

श्री द्विवेदी के लेख धर्म-महासभा के लिए बहुत बड़े थे और उनमें काँट-छाँट करनी पड़ी।

मैं धर्म-महासभा में बोला था, और उसका क्या परिणाम हुआ, यह मैं कुछ समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ जो मेरे पास हैं, उनसे उद्धृत करके लिखता हूँ। मैं डींग नहीं हाँकना चाहता, परन्तु आपके प्रेम के कारण, आपमें विश्वास करके मैं यह अवश्य कहूँगा कि किसी हिन्दू ने अमेरिका को ऐसा प्रभावित नहीं किया, और मेरे आने से यदि कुछ भी न हुआ, तो इतना अवश्य हुआ कि अमेरिकनों को यह मालूम हो गया कि भारत में आज भी ऐसे मनुष्य उत्पन्न हो रहे हैं, जिनके चरणों में सभ्य-से-सभ्य राष्ट्र भी नीति और धर्म का पाठ पढ़ सकते हैं। क्या आप नहीं समझते कि हिन्दू राष्ट्र को अपने संन्यासी यहाँ भेजने के लिए यह पर्याप्त कारण है? पूर्ण विवरण आपको वीरचन्द्र गाँधी से मिलेगा।

कुछ पत्रिकाओं के अंश मैं नीचे उद्धृत करता हूँ :

‘अधिकांश संक्षिप्त भाषण वाकपटुत्वपूर्ण होते हुए भी किसीने भी धर्म-महासभा के तात्पर्य एवं उसकी सीमाओं का इतने अच्छे ढंग से वर्णन नहीं किया, जैसा कि उस हिन्दू संन्यासी ने। मैं उनका भाषण पूरा-पूरा उद्धृत करता हूँ, परन्तु श्रोताओं पर उसका क्या प्रभाव पड़ा, इसके बारे में मैं केवल इतना ही कह सकता हूँ कि वे दैवी अधिकार से सम्पन्न वक्ता हैं और उनका शक्तिमान तेजस्वी मुख तथा उनके पीले गेरुए वस्त्र, उनके गम्भीर तथा लयात्मक वाक्यों से कुछ कम आकर्षक न थे।’ (यहाँ भाषण विस्तारपूर्वक उद्धृत किया गया है) – न्यूयार्क क्रिटिक

‘उन्होंने गिरजे और क्लबों में इतनी बार उपदेश दिया है कि उनके धर्म से अब हम भी परिचित हो गए हैं।… उनकी संस्कृति, उनकी वाकपटुता, उनके आकर्षक एवं अद्भुत व्यक्तित्व ने हमें हिन्दू सभ्यता का एक नया आलोक दिया है। उनके सुन्दर तेजस्वी मुखमण्डल तथा उनकी गम्भीर सुललित वाणी ने सबको अनायास अपने वश में कर लिया है।… बिना किसी प्रकार के नोट्स की सहायता के ही वे भाषण देते हैं, अपने तथ्य तथा निष्कर्ष को वे अपूर्व ढंग से एवं आन्तरिकता के साथ सम्मुख रखते हैं और उनकी स्वतःस्फूर्त प्रेरणा उनके भाषण को कई बार अपूर्व वाकपटुता से युक्त कर देती है।’ – वही।

‘विवेकानन्द निश्चय ही धर्म-महासभा में महान्तम व्यक्ति हैं। उनका भाषण सुनने के बाद यह मालूम होता है कि इस विज्ञ राष्ट्र को धर्मोपदेशक भेजना कितनी मूर्खता है।’ – हेरल्ड (यहाँ का सबसे बड़ा समाचार-पत्र)

इतना उद्धृत करके अब मैं समाप्त करता हूँ, नहीं तो आप मुझे घमण्डी समझ बैंठेंगे। परन्तु आपके लिए इतना आवश्यक था, क्योंकि आप प्रायः कूपमण्डूक बने बैठे हैं और दूसरे स्थानों में संसार किस गति से चल रहा है। यह देखना भी नहीं चाहते। मेरे उदार मित्र! मेरा मतलब आपसे व्यक्तिशः नहीं है, सामान्य रूप से हमारे सम्पूर्ण राष्ट्र से है।

मैं यहाँ वही हूँ, जैसा भारत में था। केवल यहाँ इस उन्नत सभ्य देश में गुणग्राहकता है, सहानुभूति है, जो हमारे अशिक्षित मूर्ख स्वप्न में भी नहीं सोच सकते। वहाँ। हमारे स्वजन हम साधुओं को रोटी का टुकड़ा भी काँख-काँखकर देते हैं, यहाँ एक व्याख्यान के लिए ये लोग एक हजार रुपया देने को और उस शिक्षा के लिए सदा कृतज्ञ रहने को तैयार रहते हैं।

वे विदेशी लोग मेरा इतना आदर करते हैं, जितना कि भारत में आज तक कभी नहीं हुआ। यदि मैं चाहूँ, तो अपना सारा जीवन ऐशो-आराम से बिता सकता हूँ, परन्तु मैं संन्यासी हूँ, और हे ‘भारत, तुम्हारे अवगुणों के होते हुए भी मैं तुमसे प्यार करता हूँ।’ इसलिए कुछ महीनों के बाद मैं भारत वापस आऊँगा और जो लोग न कृतज्ञता का अर्थ जानते है, न गुणों का आदर ही कर सकते हैं, उन्हीं के बीच नगर-नगर में धर्म का बीज बोता हुआ प्रचार करूँगा, जैसा कि मैं पहले किया करता था।

जब मैं अपने राष्ट्र की भिक्षुक मनोवृत्ति, स्वार्थपरता, गुणग्राहकता के अभाव, मूर्खता तथा अकृतज्ञता की यहाँ वालों की सहायता, अतिथि-सत्कार, सहानुभूति और आदर से, जो उन्होंने मुझ जैसे दूसरे धर्म के प्रतिनिधि को भी दिया – तुलना करता हूँ, तो मैं लज्जित हो जाता हूँ। इसलिए अपने देश से बाहर निकलकर दूसरे देश देखिए एवं अपने साथ उनकी तुलना कीजिए।

अब इन उद्धृत अंशों को पढ़ने के बाद क्या आप समझते हैं कि संन्यासियों को अमेरिका भेजना उपयुक्त नहीं है?

कृपया इसे प्रकाशित न करें। मुझे अपना नाम करवाने से वैसी ही घृणा है, जैसी भारत में थी।

मैं ईश्वर का कार्य कर रहा हूँ और जहाँ वे मुझे ले जाएँगे, वहाँ मैं जाऊँगा। मूकं करोति वाचालं – आदि; जिनकी कृपा से गूँगा वाचाल बनता है और पंगु पहाड़ लाँघता है, वे ही मेरी सहायता करेंगे। मानवी सहायता की मैं परवाह नहीं करता; यदि ईश्वर उचित समझेंगे, तो वे भारत में, अमेरिका में या उत्तरी ध्रुव-स्थान में भी मेरी सहायता करेंगे। यदि वे सहायता न करें, तो कोई भी नहीं कर सकता। भगवान् की सदा-सर्वदा जय हो।

आपका,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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