स्वामी विवेकानंद के पत्र – श्री ई. टी. स्टर्डी को लिखित

(स्वामी विवेकानंद का श्री ई. टी. स्टर्डी को लिखा गया पत्र)

द्वारा श्री एफ. लेगेट,
रिजले मॅनर,
अल्सटर काउण्टी,
न्यूयार्क

प्रिय स्टर्डी,

अधूरे पते के कारण तुम्हारा पिछला पत्र इधर-उधर चक्कर लगाकर मेरे पास पहुँचा।

संभवतः तुम्हारी आलोचना का अधिकांश न्यायसंगत एवं सही है और यह भी सम्भव है कि एक दिन तुम्हें यह पता चले कि इन सबका उदय दूसरे मनुष्यों के प्रति तुम्हारी कुछ घृणा से होता है और मैं केवल बलि का बकरा था।

फिर भी इस बात के लिए कटुता नहीं आनी चाहिए, क्योंकि अपनी समझ में मैंने किसी ऐसी चीज का दंभ नहीं किया, जो मुझमें नहीं है। न ऐसा करना मेरे लिए सम्भव है, क्योंकि मेरा एक घण्टे का सहवास भी किसी को मेरे ध्रूमपान एवं चिड़चिड़े स्वभाव आदि से परिचित करा देगा। ‘प्रत्येक मिलन वियोग से सम्बद्ध है’ – यही वस्तुओं की प्रकृति है। निराशा भी मैं नहीं महसूस करता हूँ। आशा है कि अब आप में कोई कटुता नहीं रहेगी। कर्म ही हमको मिलाता है और कर्म ही जुदा भी कराता है।

मुझे पता है कि तुम कितने संकोची हो और दूसरों की भावना को ठेस पहुँचाने से कितनी घृणा करते हो। महीनों तक चलने वाली तुम्हारी मानसिक यातना का भी मुझे पूरा एहसास है, जब तुम ऐसे लोगों के साथ कार्य करने के लिए संघर्ष-रत रहे, जो तुम्हारे आदर्श से इतने भिन्न थे। पहले मैं इसका बिल्कुल ही अनुमान नहीं कर पाया, अन्यथा मैं तुमको बहुत कुछ अनावश्यक मानसिक परेशानी से बचा सकता था। यह फिर कर्म का फल है।

हिसाब पहले नहीं पेश किया गया, क्योंकि काम अभी भी खत्म नहीं हुआ है; और मैं अपने दाता को पूरे कार्य की समाप्ति पर ही एक सर्वांगपूर्ण हिसाब देना चाहता था। अभी केवल पिछले साल ही कार्य प्रारम्भ हुआ है, क्योंकि बहुत काल तक कोष के लिए हमें प्रतीक्षा करनी पड़ी और मेरा तरीका यह है कि हम सब स्व-प्रेरित सहायता की प्रतीक्षा करते हैं, कभी माँगते नहीं।

मैं अपने समस्त कार्य में इसी विचार का अनुगमन करता हूँ, क्योंकि मैं खूब अच्छी तरह जानता हूँ कि मेरा स्वभाव बहुत से लोगों को अप्रसन्न करने वाला है। अतः तब तक इन्तजार करता हूँ, जब कोई स्वयं मुझे चाहता है। एक क्षण की सूचना पर विदा हो जाने के लिए मैं अपने को हमेशा तैयार रखता हूँ , और विदाई के मामले में न तो मैं कोई बुरा मानता हूँ और न इसके विषय में अधिक सोचता ही हूँ, क्योंकि जिस तरह का बनजारा जीवन मेरा है, उसमें ऐसी बातें हमेशा होती रहती हैं। केवल इसीलिए दुःखी हूँ कि न चाहते हुए भी मैं दूसरों को कष्ट देता हूँ। मेरी कोई डाक अगर आपके पास आये, तो कृपया भेज दीजिएगा। सदा आप सुखी-समृद्ध रहें, ऐसी मेरी सदा प्रार्थना है।

विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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