स्वामी विवेकानंद के पत्र – स्वामी रामकृष्णानन्द को लिखित (1895)

(स्वामी विवेकानंद का स्वामी रामकृष्णानन्द को लिखा गया पत्र)

द्वारा ई. टी. स्टर्डी,
हाई व्यू, कैवरशम, रीडिंग, इंगलैण्ड
१८९५

प्रिय शशि,

तुम्हारा पत्र, चूनी बाबू का पत्र और सान्याल का पत्र पहले ही मिले। आज राखाल का पत्र मिला। राखाल को गुर्दे की बीमारी (Gravel) से तकलीफ उठानी पड़ी, यह जानकर मुझे दुःख हुआ। शायद पाचन-क्रिया की गड़बड़ी से ऐसा हुआ होगा।… गोपाल का ऋण-परिशोध हो चुका है। अब उसे अपना मूड़ मुड़ा लेने को कहना। मरने पर भी सांसारिक बुद्धि दूर नहीं होती।… मठ में आकर वह काम-काज करता रहे। संसार में बहुत अधिक समय तक लिप्त रहने से दुर्बुद्धि का होना स्वाभाविक है। यदि वह संन्यास मार्ग को अपनाना न चाहे, तो उससे जगह ख़ाली कर देने को कहना। दो नावों में पैर रखनेवाले व्यक्ति को मैं नहीं चाहता हूँ – ऐसे मनुष्य जो आधे तो संन्यासी हैं और आधे गृहस्थ। लॉर्ड (Lord) रामकृष्ण परमहंस – हरमोहन की मनगढ़न्त बात है। लॉर्ड (Lord) से उसका तात्पर्य क्या है – English Lord अथवा Duke? राखाल से कहना कि लोग जो भी कुछ क्यों न कहें, उधर ध्यान देने की कोई आवश्यकता नहीं है। वे लोग तो कीड़े जैसे हैं, नितान्त नगण्य हैं। किसी प्रकार की वंचना की भावना तुम लोगों में नहीं रहनी चाहिए तथा कपटता की ओर तुम पैर न रखना। मैं अपने को कट्टरपन्थी पौराणिक अथवा निष्ठावान (छूआछूत माननेवाला) हिन्दू कब मानता था? I do not pose as one. (मैं अपने को इस प्रकार जाहिर तो नहीं करता हूँ।)… लोग क्या कहते हैं या नहीं कहते हैं, उस ओर ध्यान देने की आवश्यकता ही क्या है? वहाँ तो बारह वर्ष की लड़की को सन्तान होती है। जिनके आविर्भाव से देश पवित्र बन गया, उनके लिए एक कौड़ी का कार्य तो हुआ नहीं और फिर लम्बी-चौड़ी बातें हाँकते हैं। भाई, यह बिल्कुल ही ध्यान देने योग्य बात नहीं है कि ऐसे लोग क्या कहते है?… राम राम ! जिन लोगों का रहन-सहन, आहार-विहार, वेश-भूषा, खान-पान इत्यादि सब कुछ गन्दे हैं और जिनकी केवल मात्र जबान ही सार है, ऐसे लोगों के कहने-सुनने से होता ही क्या है? तुम अपना कार्य करते रहो। मनुष्य के मुँह की ओर क्यों ताकते हो, भगवान् पर दृष्टि रखो। गीता, उपनिषदों के भाष्य आदि तो शब्दकोश की सहायता से शरत् इन लोगों को पढ़ा सकता है न? अथवा केवल मात्र वैराग्य ही सार है? वर्तमान समय में केवल मात्र वैराग्य से क्या कभी काम चल सकता है? सबके लिए रामकृष्ण परमहंस बनना क्या सम्भव है? सम्भवतः शरत् अब तक रवाना हो चुका होगा। एक पञ्चदशी, एक गीता (जितने अधिक भाष्य सहित प्राप्त हो सकें), काशी से प्रकाशित नारद तथा शाण्डिल्यसूत्र, (सुरेश दत्त के छपे हुए ग्रन्थ में इतनी अशुद्धियाँ हैं कि ठीक ठीक अर्थ बोध भी नहीं हो पाता), पञ्चदशी का यदि कोई अच्छा अनुवाद मिले, तो उसकी एक प्रति तथा कालीवर वेदान्तवागीशकृत शांकर भाष्य का अनुवाद एवं पाणिनि-सूत्र या काशिका-वृत्ति अथवा महाभाष्य का यदि कोई बंगला या अंग्रेजी अनुवाद (इलाहाबाद के श्रीश बाबू कृत) मिले, तो भेजना। अपने बंगालियों से मुझे वाचस्पत्य कोष की एक प्रति भेजने के लिए कहना, इससे बड़ी बड़ी बातें बघारनेवालों की एक परीक्षा हो जायगी। अंग्रेजों के देश में धर्म – कर्म की गति बहुत ही धीमी है। ये लोग या तो कट्टरपन्थी होते हैं अथवा नास्तिक। कट्टरपन्थी लोगों में भी धर्म नाम मात्र का है, ‘Patriotism (देश-प्रेम) ही हमारा धर्म है’, बस, इतना ही मात्र वे मानते हैं।

पुस्तकें अमेरिका के पते पर भेजना। मेरा अमेरिका का पता इस प्रकार है – द्वारा कुमारी फिलिप्स, १९ पश्चिम ३८वाँ रास्ता, न्यूयार्क, संयुक्त राज्य अमेरिका। नवम्बर के अन्त तक मैं अमेरिका पहुँचूँगा, अतःपुस्तकें वहीं भेजना। यदि मेरे पत्र को देखते ही शरत् रवाना हो चुका हो, तब तो मुझसे उसकी भेंट हो सकती है, अन्यथा नहीं। Business is business (काम काम है।) – यह बच्चों का खेल नहीं है। स्टर्डी साहब उसे अपने घर पर लाकर रखेंगे तथा उसकी देख-भाल करेंगे। मैं तो अब की बार साधारणतया यहाँ की परिस्थिति जानने के लिए इग्लैण्ड आया हूँ; अगली गर्मी में आकर कुछ अधिक हल चल मचाने का प्रयास करूँगा। तदनन्तर अगले जाड़े में भारत जाना है। उन लोगों के साथ निरन्तर पत्र-व्यवहार करते रहना, जो हममें दिलचस्पी लेते हों, ताकि उनका interest (उत्सुकता) नष्ट न होने पाये। समग्र बंगाल में जगह जगह केन्द्र स्थापित करने का प्रयत्न करना। विशेष विवरण अगले पत्र में भेजूँगा। स्टर्डी साहब बहुत ही सज्जन तथा कट्टर वेदान्ती हैं, थोड़ा-बहुत संस्कृत भी समझ लेते हैं। बहुत कुछ परिश्रम करने पर तब कहीं इन देशों में थोड़ा-बहुत कार्य हो पाता है – बहुत ही कठिन काम है, खास कर जाड़े के दिनों में, जब कि प्रायः ही वर्षा होती रहती है। इसके अलावा अपनी गाँठ से ख़र्च कर यहाँ काम करना पड़ता है। अंग्रेज लोग भाषण सुनने के लिए या इस प्रकार के विषयों में एक पैसा भी खर्च नहीं करते। यदि वे भाषण सुनने के लिए उपस्थित हों, तो बहुत ही सौभाग्य समझना चाहिए, उनकी स्थिति भी हमारे देशवासियों की सी है। साथ ही यहाँ के लोग अभी मुझे जानते भी नहीं है। और फिर भगवान् आदि के नाम से तो वे भागने लगते हैं, उसका तात्पर्य वे यह निकालते हैं कि मैं भी सम्भवतः कोई दूसरा पादरी हूँ। तुम शान्तिपूर्वक बैठकर एक कार्य करना – ऋग्वेद से लेकर साधारण पुराण तथा तन्त्रों में सृष्टि, प्रलय, जाति, स्वर्ग, नरक, आत्मा, मन, बुद्धि, इन्द्रिय, मुक्ति, संसार (पुनर्जन्म) आदि का जो वर्णन है, उसे एकत्र करते रहना। बच्चों जैसे खेल से कोई काम नहीं होता, मुझे तो real scholarly work (पूरा पाण्डित्यपूर्ण काम) चाहिए। Material (उपादान) संग्रह करना ही मुख्य कार्य है। सबसे मेरी प्रीति कहना। इति।

तुम्हारा,
विवेकानन्द

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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