दहेज प्रथा पर निबंध

दहेज प्रथा पर निबंध इस सामाजिक समस्या के हर पहलू का विश्लेषण करता है। इस प्रथा के कई आयाम हैं, जिन्हें बिना जाने इसे पूरी तरह समझना कठिन है। विशेषतः विद्यार्थी-वर्ग के लिए इस कुरीति को समझने में यह निबन्ध सहायक रहेगा। पढ़ें दहेज प्रथा पर निबंध–

प्रस्तावना

दहेज भारतीय समाज की एक ऐसी बुराई है, जिसने महिलाओं के प्रति अकल्पनीय यातनाएं और अपराध को जन्म दिया है। इस बुराई ने समाज की सभी वर्गों की महिलाओं प्रभावित किया है – चाहे वह गरीब वर्ग से हों, मध्यम वर्ग से या अमीर। हालाँकि, गरीब वर्ग की महिलाएं जागरुकता और शिक्षा की कमी के कारण इसका शिकार सबसे ज़्यादा होती आई हैं।

दहेज का अर्थ है वो सामान, नकद, और चल या अचल संपत्ति जो दुल्हन का परिवार दूल्हे, उसके माता-पिता और उसके रिश्तेदारों को शादी के उपहार के रूप में देता है। दहेज प्रथा के अंतर्गत नकद, आभूषण, बिजली के उपकरण, फर्नीचर, बिस्तर, क्रॉकरी, बर्तन, वाहन और अन्य घरेलू सामान नवविवाहितों को घर बसाने में मदद करने के लिए दुल्हन के परिवार की ओर से दिये जाते हैं।

दहेज प्रथा दुल्हन के परिवार पर भारी आर्थिक बोझ डाल सकती है। इस प्रथा ने कई बार महिलाओं के खिलाफ अपराध को जन्म दिया है, जिसमें भावनात्मक शोषण से लेकर महिला की हत्या तक शामिल है। दहेज लेना और देना- दोनों भारतीय अधिनियम 1961 और भारतीय दंड संहिता की धारा 304B और 498A के तहत अपराध है।

हालांकि दहेज के खिलाफ देश में कानून कई दशक पहले लागू किए जा चुके हैं, लेकिन ये काफी हद तक अप्रभावी रहे हैं और इस कुप्रथा पर लगाम लगाने में नाकाम। भारत के कई हिस्सों में दहेज से होने वाली मौतों और हत्याओं की प्रथा अनियंत्रित रूप से जारी है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के अनुसार यदि पत्नी दहेज उत्पीड़न की शिकायत करती है तो दूल्हे और उसके परिवार को स्वत: गिरफ्तार कर लिया जाना चाहिए। इस कानून का व्यापक रूप से दुरुपयोग हुआ है, और दहेज प्रथा को कम करने में भी यह विफल हुआ है।

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दहेज प्रथा पर निबंध – ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

एशियाई उपमहाद्वीप में दहेज का इतिहास स्पष्ट नहीं है। कुछ विद्वानों का मानना है कि प्राचीन काल में दहेज प्रथा का प्रचलन था, लेकिन कुछ ऐसा नहीं मानते हैं। कई इतिहासकारों का मानना है कि प्राचीन भारत में दहेज महत्वहीन था, और बेटियों के पास विरासत के अधिकार हासिल थे (लड़की के कोई भाई न होने की परिस्थिति में)। लड़की की शादी के वक़्त यह विरासत उसे सौंप दी जाती थी।

दस्तावेजी साक्ष्य बताते हैं कि 20वीं शताब्दी की शुरुआत में दहेज के बजाय दुल्हन की कीमत तय की जाती थी, जिसके परिणामस्वरूप अक्सर बहुत गरीब लड़के अविवाहित रह जाते थे।

1956 से पहले, ब्रिटिश राज के दौरान, बेटियों को अपने परिवार की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं था। 1956 में, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत हिंदू, सिख और जैन परिवार के बेटियों और बेटों को समान कानूनी दर्जा मिला।

नए हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) कानून के बावजूद, दहेज एक ऐसी प्रक्रिया के रूप में जारी रहा, जिसके तहत माता-पिता की संपत्ति, अदालती प्रक्रिया के बजाय, एक सामाजिक प्रक्रिया द्वारा बेटी को उसकी शादी के दौरान दी जाती है।

दहेज ने कम से कम सैद्धान्तिक रूप से महिलाओं को उनके विवाह में आर्थिक और वित्तीय सुरक्षा प्रदान की। इसने पारिवारिक संपत्ति के टूटने को रोकने में मदद की और साथ ही, दुल्हन को भौतिक रूप से सुरक्षित किया।

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भारत में दहेज प्रथा के कारण

कई आर्थिक और सामाजिक मुद्दों और परिस्थितियों ने भारत में दहेज प्रथा को बढ़ावा दिया है।

आर्थिक कारक

कई ऐसे आर्थिक कारण हैं जो दहेज प्रणाली में योगदान करते हैं। इनमें विरासत प्रणाली और दुल्हन की आर्थिक स्थिति शामिल हैं।
कुछ विशेषज्ञों और जानकार लोगों का मानना है कि कमजोर कानूनी संस्थान महिलाओं को नुकसान में रखते हैं और विरासत का अधिकार केवल बेटों को दिया जाता है। यह महिलाओं को अपने पति और ससुराल वालों पर आर्थिक रूप से निर्भर बना देता है। इससे महिलाओं के शोषण को और दहेज की कुप्रथा को बल मिलता है।

सामाजिक परिस्थिति

भारत के कुछ हिस्सों में विवाह की संरचना और रिश्तेदारी दहेज में योगदान करती है। उत्तरी भारत में, विवाह आमतौर पर एक पितृस्थानीय (पति के परिवार के साथ रहना) प्रणाली का पालन करता है, जहां दुल्हन परिवार का एक गैर-संबंधित सदस्य होता है। यह व्यवस्था दहेज को बढ़ावा देती है।
इसके विपरीत देश के दक्षिण में, विवाह अक्सर दुल्हन के परिवार के भीतर आयोजित किया जाता है, उदाहरण के लिए करीबी रिश्तेदारों या क्रॉस-चचेरे भाई के साथ। इसके अलावा, वधू के पास भूमि का उत्तराधिकार होता है, जिससे दहेज की संभावना कम हो जाती है।

शादी के रीति-रिवाजों के अलावा, सामाजिक रीति-रिवाज और लड़के के माता-पिता की दहेज को लेकर अपेक्षाएँ वो महत्वपूर्ण कारण हैं, जो दहेज प्रथा को बढ़ावा देते हैं। दहेज प्रथा काफी हद तक भारतीय समाज की पितृसत्तात्मक प्रकृति की अभिव्यक्ति है जहाँ पुरुषों को शारीरिक और मानसिक क्षमताओं के मामले में महिलाओं से श्रेष्ठ माना जाता है। ऐसी सामाजिक संरचना की पृष्ठभूमि के साथ, महिलाओं को अक्सर दूसरे दर्जे की नागरिक माना जाता है और ये धारणाएं भी दहेज का एक प्रमुख कारण हैं।

हालांकि हमारा देश महिलाओं के अधिकारों को लेकर सजग हो रहा है, फिर भी, महिलाएं अपने परिवार में एक अधीनस्थ स्थिति में बनी हुई हैं। महिलाओं की शिक्षा, आय और स्वास्थ्य- कुछ ऐसे महत्वपूर्ण कारक हैं जो दहेज प्रथा में योगदान देते हैं। इसके अलावा, दहेज के मामले में यह बात भी मायने रखती है कि एक महिला का अपनी शादी पर कितना नियंत्रण है।

धार्मिक कारक – दहेज प्रथा पर निबंध

विवाह के रीति-रिवाजों पर लगाए गए धार्मिक प्रतिबंध, अंतर-जातीय विवाह और विभिन्न संप्रदायों के बीच की शादी को खुलकर स्वीकार न किया जाना शादी के लिए उपयुक्त लड़कों की संख्या को कम कर देता है। इससे अपनी ही धर्म-जाती के लड़के को, मुंह-मांगा दहेज देकर लड़की के परिवार वाले रिश्ता स्वीकार करने पर मजबूर हो जाते हैं।

भारत में दहेज किसी धर्म विशेष तक सीमित नहीं है। यह हिंदुओं के अलावा अन्य धर्मों में भी व्यापक है। उदाहरण के लिए, भारतीय मुसलमान दहेज को जाहेज कहते हैं, और इस प्रथा को जाहेज-ए-फातिमी के संदर्भ में उचित ठहराते हैं। मुस्लिम समुदाय जाहेज़ को दो श्रेणियों में बांटता है: पहले में दुल्हन के पहनावे के साथ-साथ वैवाहिक जीवन के लिए कुछ आवश्यक सामान शामिल हैं; दूसरी श्रेणी में कीमती सामान, कपड़े, गहने, और दूल्हे के परिवार के लिए नकद आदि शामिल हैं। जाहेज़ महर के रूप में नकद भुगतान से भिन्न है। महर शरीयत धार्मिक कानून की आवश्यकता है।

संकीर्ण मानसिकता

हमारे देश में, दहेज को अक्सर दूल्हे की शिक्षा और करियर पर हुए खर्चे की भरपाई के रूप में देखा जाता है। दुल्हन की शिक्षा, करियर और धन की पूरी तरह से अवहेलना की जाती है, क्योंकि उसे एक पुरुष के समान सामाजिक दर्जा नहीं दिया जाता है। इसलिए, भौतिक लाभों के लालच में दहेज को उचित ठहराया जाता है।

दहेज की मांग अक्सर समाज के सामूहिक लालच का परिणाम होती है। सामाजिक प्रतिष्ठा के नाम पर जबरन वसूली, मांगों को बेशर्मी से आगे रखना और दहेज की मांग को अपना हक़ समझना भारतीय शादियों की एक प्रमुख विशेषता है।

सामाजिक प्रतिष्ठा का मापदंड

दहेज अक्सर हमारे देश में सामाजिक कद दिखाने का एक साधन है। समाज में किसी की कीमत अक्सर इस बात से मापी जाती है कि उसने बेटी की शादी में कितना खर्च किया या कितना दहेज दिया। यह दृष्टिकोण दहेज की माँगों की प्रथा को काफी हद तक सही ठहराता है। लड़के के परिवार को उनकी नई दुल्हन द्वारा लाए गए दहेज की मात्रा के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा की नई ऊंचाइयां मिलती हैं, जो इस बात का सूचक है कि उनका लड़का शादी के बाजार में कितना वांछनीय था। आइए, अब दहेज प्रथा पर निबंध में आगे विश्लेषण करते हैं महिलाओं की सामाजिक स्थिति का।

महिलाओं की सामाजिक स्थिति

भारतीय समाज में महिलाओं की निम्न सामाजिक स्थिति राष्ट्र के मानस में इतनी गहरी जड़ें जमा चुकी है कि उनके साथ यह व्यवहार न केवल परिवार द्वारा बल्कि खुद महिलाओं द्वारा भी बिना किसी प्रश्न के स्वीकार किया जाता है। जब विवाह को महिलाओं की अंतिम उपलब्धि के रूप में देखा जाता है, तो दहेज जैसी कुरीतियां समाज में अपनी जड़ें गहरी कर लेती हैं।

रूढ़िवादी परम्पराएँ

भारतीय परंपराओं को बहुत महत्व देते हैं और वे रीति-रिवाजों पर सवाल नहीं उठाते हैं। वे परंपराओं का आंख मूंदकर पालन करते हैं और ज़्यादातर भारतियों के लिए दहेज लेना-देना भी बाकी परम्पराओं की तरह एक अनिवार्य रूप से निभाई जाने वाली परंपरा है।

दहेज विरोधी कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन

कई दशकों में, भारत सरकार ने दहेज प्रथा को नियंत्रित करने के लिए कई कानून बनाए हैं। इनमें 1961 का दहेज निषेध अधिनियम और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 शामिल है। लेकिन, इस सामाजिक बुराई में सामूहिक भागीदारी के कारण ऐसे कानूनों का कार्यान्वयन अप्रभावी रहा है।

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आधुनिक युग में दहेज

दहेज प्रथा पर निबंध में अब बात करते हैं कि दहेज प्रथा का वर्तमान स्वरूप कैसे विकसित हुआ। जब पुराने समय में दहेज का विकास हुआ, तो ऊंची जातियों द्वारा दुल्हन को लाभ पहुंचाने के लिए इसका पालन किया गया, क्योंकि बेटियाँ हिंदू कानून के तहत संपत्ति का वारिस बनने में असमर्थ थी। इस रिवाज का मुकाबला करने के लिए, दुल्हन के परिवार ने दूल्हे को दहेज प्रदान किया जिस पर दुल्हन का अधिकार माना जाता था। इस दहेज को स्त्रीधन के रूप में देखा जाता था। साथ ही, एक महत्वपूर्ण अंतर यह भी था कि जब ऊंची जातियां दहेज का अभ्यास करती थीं, तो निचली जातियों ने अपने परिवार को आय के नुकसान की भरपाई के लिए दुल्हन का मूल्य निर्धारित किया, जो दुल्हन के परिवार को दूल्हे द्वारा दिया जाता था।

आधुनिक युग में दहेज की नयी अवधारणा विकसित हुई और भारतीय परिवार अब दहेज की पारंपरिक अवधारणा का अभ्यास नहीं करते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि समय बीतने के साथ, दुल्हन की कीमत धीरे-धीरे गायब हो गई और दहेज पारिवारिक संपत्ति हस्तांतरण का प्रचलित रूप बन गया।

चूंकि भारत में विवाह बड़े समारोह के रूप में होते हैं, इसलिए वे बहुत भव्य होते हैं। भारतीय शादियों में, आमतौर पर, परिवार के दोनों पक्षों द्वारा ताम-झाम, साज-सज्जा, खान-पान और शादी के उपहार आदि पर काफी खर्च किया जाता है। यह व्यय स्वेच्छा से किया जाता है और धन, स्थिति आदि के आधार पर एक परिवार से दूसरे परिवार में भिन्न होता है।

कई बार, इस आपसी ‘देने और लेने’ के हिस्से के रूप में, दूल्हे के परिवार द्वारा दहेज की विशिष्ट मांगों के साथ-साथ प्रत्येक उपहार की मात्रा निर्धारित की जाती है। ऐसी परिस्थितियों में, दुल्हन के परिवार पर, कई बार जबरदस्ती की जाती है और यही आज के समय में दहेज के खतरे के रूप में उभरने लगा है।


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दहेज हत्या पर निबंध – दहेज अपराधों के प्रकार

भारत में, महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा में दहेज को एक प्रमुख योगदानकर्ता माना जाता है। इनमें से कुछ अपराधों में शारीरिक हिंसा, भावनात्मक शोषण और दुल्हन की हत्या भी शामिल है।

भारतीय कानून के अनुसार, दहेज अपराध कई प्रकार के हो सकते हैं, जैसे कि – क्रूरता (जिसमें यातना और उत्पीड़न शामिल हैं), घरेलू हिंसा (शारीरिक, भावनात्मक या यौन हमले), आत्महत्या के लिए उकसाना और दहेज हत्या (दुल्हन को जलाने और हत्या के मुद्दों सहित)।

क्रूरता

किसी महिला को पैसों या संपत्ति के लिए मजबूर करना, उस पर अत्याचार करना या उसका उत्पीड़न करना दहेज अपराध का एक रूप है। क्रूरता मौखिक हमलों के रूप में या पिटाई या उत्पीड़न के रूप में हो सकती है।

घरेलू हिंसा

घरेलू हिंसा में अपमानजनक और धमकी भरे व्यवहार के साथ-साथ शारीरिक, भावनात्मक, आर्थिक और यौन हिंसा, डराना, अलगाव और जबरदस्ती शामिल है। महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए प्रोटेक्शन ऑफ वुमेन फ़्रोम डोमेस्टिक वायलेंस 2005 (Protection of Women from Domestic Violence Act 2005) जैसे कानून हैं जो घरेलू हिंसा को कम करने में मदद करते हैं।

आत्महत्या के लिए उकसाना

दहेज अपराध में आत्महत्या के लिए उकसाना, आत्महत्या करने की सलाह देना, प्रोत्साहित करना या सहायता करना- आदि भी शामिल हैं। दहेज से संबंधित दुर्व्यवहार अक्सर नवविवाहिताओं में भावनात्मक आघात, अवसाद और आत्महत्या का कारण बनता है।

दहेज हत्या

यदि दहेज प्रथा पर निबंध लिखा जाए, तो दहेज हत्या की समस्या पर चिंतन बेहद ज़रूरी हो जाता है। दहेज हत्या एक दुल्हन की, उसके पति और उसके परिवार द्वारा दहेज से असंतुष्ट होने के कारण, शादी के तुरंत बाद की गई हत्या को माना गया है। यह आम तौर पर, पति के परिवार द्वारा घरेलू दुर्व्यवहारों की परिणति होती है। दहेज से अधिकतर मौतें तब होती हैं जब उत्पीड़न और यातना को सहन करने में असमर्थ युवती फांसी लगाकर या जहर खाकर आत्महत्या कर लेती है। भारतीय कानून के तहत इसे भी दहेज हत्या की श्रेणी में डाला गया है। दहेज हत्या में दुल्हन को जलाना भी शामिल है।

दुल्हन के जलने को अक्सर दुर्घटना या आत्महत्या के प्रयास के रूप में छिपाने का प्रयास किया जाता है। हत्या के बाद अपर्याप्त सबूत और जीवित रहने की कम संभावना जैसे कई कारणों से दुल्हन को जलाना दहेज हत्याओं का सबसे आम रूप है। दुल्हन को जलाने के अलावा जहर देने, गला घोंटने, एसिड अटैक आदि दहेज संबंधी हत्या के कुछ अन्य उदाहरण हैं।

नयी विवाहित महिलाएं दहेज संबंधी हिंसा का शिकार अधिक होती हैं क्योंकि वे अपने पति से आर्थिक और सामाजिक रूप से बंधी होती हैं। कुछ मामलों में, दुल्हन के परिवार से अधिक संपत्ति निकालने के लिए दहेज के लिए तरह-तरह की धमकियाँ दी जाती हैं और यह नई दुल्हनों के मामलों में सबसे आम है। भारत के उत्तरी राज्यों में दक्षिण के मुक़ाबले दहेज से संबंधित हिंसा की दर काफी ऊंची दिखाई देती है।

दहेज के दुष्परिणाम

इस कुप्रथा के समाज पर बहुत-से दुष्प्रभाव हैं। साथ ही ये दुष्प्रभाव बहुत गहरे हैं, जिसकी वजह से इनका निराकरण काफ़ी हद तक मुश्किल हो चुका है। यदि दहेज प्रथा को जड़ से ख़त्म करना है, तो पहले समाज पर इसके दुष्परिणामों की विवेचना आवश्यक है।

दहेज से बाल विवाह की संभावना अधिक होती है

दहेज से बचने के लिए, परिवार अक्सर अपनी बेटियों की शादी बचपन में ही कर देते हैं। भारत में, दुनिया की सबसे अधिक बाल वधूएं हैं और यह घटना आंशिक रूप से दहेज प्रथा से प्रेरित है। गरीब परिवार यह मानते हैं कि एक लड़की जितनी छोटी होगी, उसके दहेज की कीमत उतनी ही कम होगी, इसलिए पैसे बचाने के लिए, परिवार कम उम्र में अपनी बेटियों की शादी कर देते हैं।

दहेज लड़कियों की शिक्षा में एक बड़ी बाधा है

दहेज प्रथा लड़कियों को स्कूल जाने से भी रोकती है क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार लड़की की शिक्षा पर खर्च करने की बजाय उसकी शादी के लिए पैसा जमा करना बेहतर समझते हैं।

लड़की का परिवार उसकी स्कूल की फीस को पैसे की बर्बादी के रूप में देखता है क्योंकि उस निवेश की भरपाई लड़की द्वारा जीवन में बाद में नहीं की जा सकती।

दहेज लैंगिक असमानता को बढ़ावा देता है

दहेज प्रथा के कारण महिलाओं को एक बोझ के रूप में देखा जाता है। दहेज का भुगतान एक ऐसी व्यवस्था को पुष्ट करता है जहां महिलाओं को द्वितीय श्रेणी के नागरिक के रूप में देखा जाता है। इससे समाज में महिलाओं को पुरुषों से कमतर समझने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

दहेज प्रथा के कारण ही बेटियों को बेटों के बराबर महत्व नहीं दिया जाता है। समाज में, कई बार यह देखा गया है कि उन्हें एक दायित्व के रूप में देखा जाता है और उन्हें शिक्षा या अन्य सुविधाओं में सेकेंड हैंड ट्रीटमेंट दिया जाता है।

दहेज भ्रूण हत्या को बढ़ावा देता है

दहेज के कारण महिलाओं को परिवार पर आर्थिक बोझ के रूप में देखा जाता है। इस बोझ को कम करने के लिए कई माता-पिता लड़कियों का गर्भपात करवा देते हैं या उन्हें जन्म के बाद मार देते हैं।

2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, 0-6 आयु वर्ग में भारत में प्रत्येक 100 लड़कों पर मात्र 914 लड़कियां हैं। भ्रूण हत्या या गर्भ में ही लड़की को मार देना इस लिंग अनुपात का सबसे बड़ा कारण है।

दहेज प्रथा गरीब लोगों को कर्ज में फंसा देती है

दहेज कुप्रथा अक्सर गरीब परिवारों को भारी ब्याज दरों पर ऋण लेने के लिए मजबूर कर देती है। कई परिवार शादी के लिए पैसे जुटाने के लिए अपनी जमीन तक बेच देते हैं या गिरवी रख देते हैं।

कुछ माता-पिता दहेज के लिए अपनी खेती की जमीन बेचते हैं, तो कुछ साहूकारों से ऊंचे ब्याज पर ऋण लेते हैं और भारी कर्ज में फंस जाते हैं।
कई लोगों के लिए, दहेज परिवार पर एक बड़ा वित्तीय बोझ बन जाता है, और दूल्हे की मांगें परिवार को आर्थिक रूप से कमजोर बना देती हैं। दहेज की मांग समय के साथ बढ़ती ही जा रही है।

महिलाओं में आत्म-सम्मान की हानि

एक ऐसे देश में, जिसने सदियों से महिलाओं के प्रति हीन भावना को पनपने का अवसर दिया है, एक महिला के लिए अपना आत्म-सम्मान बनाए रखना बहुत कठिन है। दहेज की कुप्रथा अक्सर शादी के लायक महिलाओं में हीन भावना का विकास करती हैं और उनके समग्र विकास को रोकती हैं।

दहेज प्रथा का समाधान

दहेज प्रथा पर निबंध में अब विश्लेषण करते हैं कि इस बुराई को समाज से सदैव के लिए मिटाने के क्या उपाय हैं–

शिक्षा

भारत में दहेज उन्मूलन के लिए शिक्षा प्राथमिक उत्प्रेरक हो सकती है। शिक्षा महिलाओं के लिए समान अधिकार और स्वतंत्रता ला सकती है, लैंगिक समानता और आत्म-निर्भरता को प्रोत्साहित कर सकती है। इसके अलावा शिक्षा ही वह हथियार है जो महिलाओं को अपने अधिकारों के प्रति सजग और जागरूक बना सकती है।

मानसिकता में बदलाव

दहेज के अन्यायपूर्ण रिवाज के खिलाफ लड़ने के लिए समाज को अपनी मौजूदा मानसिकता में बड़े बदलाव की आवश्यकता है। उन्हें इस तथ्य को समझने की जरूरत है कि आज के समाज में महिलाएं कुछ भी करने में पूरी तरह सक्षम हैं हैं। महिलाओं को खुद में यह विश्वास जगाने कि जरूरत है कि वे पुरुषों से कमतर नहीं हैं और न ही उन्हें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पुरुषों पर निर्भर रहने की जरूरत है।

जागरूकता अभियान

आधुनिक युग में मीडिया ज्ञान और सूचनाओं के आदान-प्रदान का प्रसारक है। चूंकि सरकार दहेज से संबंधित अपराधों में बदलाव को लागू करने में अप्रभावी रही है, इसलिए मीडिया अभियान नागरिकों को दहेज विरोधी नियमों का पालन करने के लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। मीडिया द्वारा बनाई गई सामाजिक जागरूकता दहेज प्रथा के उन्मूलन में सफल साबित हो सकती है। यह एक ऐसा आंदोलन है, जिसे अकेले सरकार हासिल नहीं कर सकती; दहेज की बुराई को हटाने के लिए सक्रिय सामुदायिक भागीदारी एक प्राथमिक शर्त है।

उपसंहार

दहेज प्रथा को मिटाने के लिए ही नहीं, बल्कि कई योजनाओं को लाकर बालिकाओं की स्थिति को ऊपर उठाने के लिए सरकार कई कानून और सुधार लेकर आई है।

यह हम सभी पर निर्भर है कि हम इस बुराई को समाज से मिटाने के लिए क्या कदम उठाते हैं और कितनी हिम्मत जुटा पाते हैं। हमें न सिर्फ अपनी बेटियों को महत्व देना होगा बल्कि उन्हें शिक्षित व आत्म-निर्भर भी बनाना होगा ताकि बड़े होने पर दूसरों को उनकी कीमत का पता चल सके।

सबसे अधिक ज़रूरी है, हमें अपनी व समाज की सोच में बड़ा परिवर्तन लाने की और शादियों में दौलत के प्रदर्शन को बंद करने की। हमें यह समझना होगा कि शादी कोई नुमाइश की क्रिया नहीं है बल्कि यह एक ऐसी सामाजिक प्रक्रिया है जिसमें दो लोग जीवन भर एक दूसरे का साथ निभाने की कसमें खाते हैं। अत: इस प्रक्रिया को जितनी सादगी के साथ निभाया जाएगा, यह उतनी ही पवित्र और खूबसूरत नज़र आएगी।

हमें आशा है कि दहेज प्रथा पर निबंध आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगा। इसमें इस कुप्रथा के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गयी है और इससे मुक्ति के उपायों का भी विश्लेषण है। यदि दहेज प्रथा पर निबंध में कोई बिंदु छूट गया हो, तो कृपया टिप्पणी करके हमें अवश्य सूचित करें। हम जल्द-से-जल्द उसे यहाँ सम्मिलित करने का प्रयास करेंगे।

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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