प्रदूषण पर निबंध – Pradushan Par Nibandh

“प्रदूषण पर निबंध” न केवल स्कूल-कॉलेज के असाइन्मेंट्स में काम में आता है, बल्कि इस विषय को समझना प्रकृति को बचाने के लिए ज़रूरी है। प्रदूषण कई तरह का होता है, जिन्हें जानना-समझना आवश्यक है। आइए, पढ़ते हैं “प्रदूषण पर निबंध” हिंदी में–

प्रस्तावना – Essay On Pollution In Hindi

विभिन्न विशैले तत्त्वों का वातावरण में मिलना ही प्रदूषण कहलाता है। जिसके कारण प्रकृति की छोटी से छोटी इकाई को भी संकट का सामना करना पड़ता है। बात शुद्धता विचारों की हो या वातावरण की जीवन में शुद्धता का बहुत महत्त्व है।

रोज़मर्रा की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा स्वस्थ रहने के लिए खाना, पानी, हवा, पेड़-पौधों की शुद्धता के साथ-साथ अनुकूल शांति भी प्रत्येक प्राणी के जीवन में बहुत महत्त्व रखता है। कवियों ने भी प्रकृति के सौन्दर्य पर कविताएँ लिखी हैं और गीत गाए हैं। वही प्रकृति अब मनुष्य की ग़लतियों के परिणामस्वरूप बद-से-बदतर होती जा रही है। अतः इस समस्या के हल के लिए सबसे पहले समझना होगा कि प्रदूषण है क्या।

प्रदूषण क्या है?

आधुनिक युग में आधिनिकता के नाम पर मनुष्य ने पकृति के साथ जो छेड़-छाड़ किया है और उसे हानि पहुँचाया है; उसी का नाम है:- प्रदूषण अर्थात् कहा जा सकता है कि शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध खाद्य, शांत वातावरण का न मिलना प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन वायुमंडल की ओज़ोन परत में छिद्र करने वाला प्रदूषक है। जिसके कारण फसलें, पेड़-पौधे, बच्चें-बुढ़ें आदि अधिक प्रभावित होते हैं। विश्व में अनेक ऐसे रोग सामने आ रहे हैं जो बढ़ते प्रदूषण का परिणाम सिद्ध हो रहे हैं और यह एक बड़ी समस्या के रूप में बनी हुई है। गंदे पानी का जगह-जगह जमाव, रासायनिक गैसों का अधिक प्रयोग, अधिक शोर, अधिक उष्मा, रासायनिक खाद का प्रयोग आदि प्रदूषण को दिन प्रति दिन बढ़ावा दे रहे हैं| समसामयिक काल में मनुष्य ने अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए पेड़ों की अंधाधुंध कटाई की जिसके परिणाम स्वरूप पर्यावरण का संतुलन चरमरा गया; आज भी पेड़ों की अंधाधुंध कटाई में कोई परिवर्तन नहीं आया हैं। वातावरण का प्रदूषित होना एक गंभीर समस्या बन चुकी है इसी को ध्यान में रखते हुए तथा प्रकृति के महत्त्व को समझाने और लोगों के बीच जागरुकता फैलाने के उद्देश्य से 5 जून 1973 को पहला पर्यावरण दिवस मनाया गया इसके बाद प्रत्येक वर्ष 5 जून को पर्यावरण दिवस मनाया जाता है।

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पर्यावरण प्रदूषण के प्रकार (वातावरण प्रदूषण)

पर्यावरण शब्द ‘परि’ तथा ‘आवरण’ के संयोग से बना है विश्व में व्यक्ति के आस-पास या उसके अतिरिक्त जो कुछ भी है वह उसका पर्यावरण है। जल, वायु, मिट्टी पर्यावरण के मुख्य भाग हैं। औद्योगीकरण और नगरीकरण पर्यावरण-प्रदूषण में वृद्धि करने वाले मुख्य कारक हैं|

जल प्रदूषण (पाणी प्रदूषण / नदी प्रदूषण / पानी प्रदूषण / भूजल प्रदूषण)

जल प्रदूषण को मराठी में पाणी प्रदूषण के नाम से भी जाना जाता है; स्वच्छ जल के बिना स्वस्थ मानव-जीवन की कल्पना करना संभव नहीं है, पाणी प्रकृति का अभिन्न अंग है। उद्योगों से निकलने वाला गंदा जल नदी-नालों में मिलकर जल-प्रदूषण का एक विराट रूप धारण कर लेता हैं। जनसंख्या वृद्धि के कारण जल का प्रयोग तथा उसकी माँग बढ़ती जा रही है, शहरों में पीने का पानी एक बड़ी समस्या बनी हुई है और पानी की अत्यधिक कमी के कारण लोग आपस में लड़ने लगते हैं। लगातार बोरिंग तथा पानी के व्यर्थ प्रयोग के कारण धरती पर पानी का स्तर घटता जा रहा है। लोग कूड़ा-कचरा, उद्योगों का रासायनिक अपशिष्ट, पूजा-पाठ के नाम पर जो भी अपशिष्ट बचता है उसे नदी तथा नालों में गिरा देते है। आज कुल नदी जल का 70 प्रतिश से भी अधिक जल प्रदूषित हो चुका है; जिसमें गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु आदि शामिल हैं। यमुना नदी को उसके आस-पास रहने वाले लोगों ने बहुत गंदा कर दिया है जिसके कारण अब वह पूरी तरह नाले के रूप में नज़र आती है। यमुना नदी को प्रदूषण मुक्त बनाने के लिए सरकार को लगातार प्रयास करना चाहिए और सख़्त से सख़्त नियम भी बनाना चाहिए।

नदियों की तरह समुद्र में भी रासायनिक तरल पदार्थ, समुद्री-जहाज़ों से तेल का रिसाव, कूड़ा-कचरा, प्लास्टिक, उद्योगों के अपशिष्ट आदि डाले जा रहे है; जिसके कारण समुद्र का जल और भी अधिक प्रदूषित होते जा रहा है। इसका परिणाम यह है कि समुद्र के जीव-जंतु मर रहे है तथा उनकी प्रजातियाँ धीरे-धीरे समाप्त हो रही है साथ ही हानिकर शैवाल एवं आक्रमक प्रजातियाँ भी जन्म ले सकती हैं। जल प्रदूषण के हानिकारक प्रभाव को कम करने के लिए कुछ प्रयास आवश्यक है; जैसे:- उद्योगों के रासायनिक जल को नदी तथा समुद्र में डालने पर प्रतिबंध लगाना, पीने के जल को व्यर्थ न बहाना, किसी भी प्रकार का कूड़ा-कचरा नदी या समुद्र के जल में न फेंकना आदि। जल प्रदूषण को समाप्त करने के लिए सरकार को भी नियम निर्धारित करने चाहिए

वायु प्रदूषण (हवा प्रदूषण / हवेचे प्रदूषण)

हवा प्रदूषण को मराठी में हवेचे प्रदूषण के नाम से भी जाना जाता है। हवा प्रकृति के प्रत्येक जीव के लिए आवश्यक तत्त्व है एवं यह प्रत्येक जीव-जंतु को ऑक्सीजन प्रदान करती है। वायु एक सुरक्षा परत के समान पृथ्वी को चारों ओर से घेरे हुए हैं। वायुमण्डल की अनुपस्थिति के कारण तापमान बढ़ या घट सकता है जो कि हवा को प्रदूषित करने में सहायक होता है तथा विभिन्न प्रकार के बिमारियों को जन्म देता हैं।

वाहनों, उद्योगों, घरों से निकले वाला धुआँ और ज़हरीले गैसों का वायु में मिश्रण एक प्रकार से कह सकते है कि मानव जीवन की समाप्ति का संकेत ही है। वायु प्रदूषण पृथ्वी पर तब से उपस्थित है जब मानव ने आग का आविष्कार किया था, उस समय वायुमण्डल का संतुलन बना रहता था लेकिन आधुनिक युग में मानव की कभी न समाप्त होने वाली लालच तथा और अधिक पाने की इच्छा, क्लोरो-फ्लोरो-कार्बन का अधिक प्रयोग, तकनीकी प्रगति का अधिक उपयोग ने हवा के संतुलन को असंतुलित कर दिया और ये सब वायु प्रदूषण के मुख्य कारण भी हैं। जंगलों तथा खेतों में लगने वाली आग, परिवहन से निकलने वाला धुआँ, प्लास्टिक को जलाना, कोयले को जलाना, अम्लीय वर्षा, परमाणु बम तथा पटाखों का निर्माण आदि वायु प्रदूषण में वृद्धि करते हैं। भारत के लिए वायु प्रदूषण अधिक चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि विश्व के लगभग 11 सबसे अधिक प्रदूषित शहर हमारे देश में ही उपस्थित हैं। इस समस्या के समाधान के लिए जिन उद्योगों से अधिक प्रदूषण हो रहा है उन्हें बंद करना, अधिक से अधिक पेड़-पौधों को उगाना, वाहनों के अधिक प्रयोग और विषैले गैसों के उपयोग से बचना तथा सार्वजनिक वाहनों का अधिक प्रयोग करना, चिमनी की ऊँचाई को बढ़ाना, शहर में मानव द्वारा मास्क का प्रयोग करना, रोजमर्रा के जीवन में सौर ऊर्जा का अधिक प्रयोग करके आदि प्रयासों के माध्यम से वायु प्रदूषण को रोका जा सकता है। इसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक को सकारात्म विचारों के साथ आगे आना होगा क्योंकि एकता में बल है और इसके सहयोग से बड़ी से बड़ी समस्या का भी हल किया जा सकता है

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ध्वनि प्रदूषण (शोर प्रदूषण)

मधुर आवाज़ मनुष्य के कानों को प्रिय लगती हैं लेकिन कुछ ध्वनियाँ ऐसी भी हैं जो शोर बन जाती है, जिनका बुरा प्रभाव मनुष्य मस्तिष्क के साथ-साथ जीव-जंतुओं पर भी पड़ता हैं और यही हानिकारक प्रभाव ध्वनि प्रदूषण कहलाता है। सड़क पर वाहनों का शोर, रेलगाड़ियों का शोर, हवाई जहाज का शोर, कारखानों का शोर, मनोरंजन के लिए देर रात तक तेज़ आवाज़ में बजने वाले “पॉप संगीत” का शोर, किसी समारोह के लिए किए जाने वाले प्रचार-प्रसार का शोर, घर में बर्तनों का अधिक शोर, गली मोहल्लों में होने वाले झगड़े भी ध्वनि प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। इसके आलावा प्राकृतिक कारण भी हैं; जैसे:- भूकंप, पहाड़ो का टूटना, बादलों तथा ज्वालामुखी बिस्फोट आदि लेकिन कभी-कभी यह शोर ज़्यादा समय के लिए नहीं होते इसलिए शोर प्रदूषण बढ़ाने में ज़्यादा सहायक सिद्ध नहीं होते।

लोगों की अपनी-अपनी पसंद है कुछ लोग तेज़ आवाज़ में संगीत सुनना पसंद करते है तो कुछ लोगों को ऐसा संगीत शोर लगता है, ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को शहर अत्यधिक शोर वाली जगह जान पड़ती है इसे ही ध्यान में रखते हुए वैज्ञानिकों ने ध्वनि मापन की एक पद्धति को विकसित किया जिसे डेसीबल में मापा जाता है और इसे “ध्वनि मापक यंत्र” कहते है। 90 डेसीबल से ऊपर की ध्वनि को मानव के लिए हानिकारक बताया गया है क्योंकि ऐसे शोर वाले वातावरण में रहने से मनुष्य के कान प्रभावित होते हैं और वह बहरे भी हो सकते है, साथ ही जीव-जंतुओं के स्वभाव भी आक्रामक हो सकते है। ध्वनि प्रदूषण पर रोक-थाम के लिए संविधान में पारित कानून का सही इस्तेमाल किया जा सकता है ‘जिसमें बताया गया है कि भारत का कोई भी नागरिक अपने आस-पास हो रहे अत्यधिक शोर को बंद करवा सकता है’ इसके साथ ही जागरूकता फैला कर, अधिक आवाज़ करने वाले मशीनों में तेल डालकर, अत्यधिक तेज़ आवाज़ में संगीत न सुनना तथा अत्यधिक शोर करने वाले उपकरणों का प्रयोग कम करना आदि उपायों द्वारा ध्वनि प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों से बचा जा सकता है।

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भूमि प्रदूषण (मृदा प्रदूषण / मिट्टी प्रदूषण / माती प्रदूषण / जमीन प्रदूषण / जैविक खाद से प्रदूषण कम)

भूमि प्रदूषण भी जल प्रदूषण के समान ही एक गंभीर समस्या बन चुका है। उद्योगों का हानिकारक ठोस कूड़ा-कचरा ख़ाली जमीनों पर डालना, लगातार वनों की कटाई कर उद्योगों का निर्माण, जनख्या में दिन-प्रतिदिन वृद्धि, फसल में वृद्धि के लिए रासायनिक खाद तथा कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग जिससे मिट्टी अपनी गुणवत्ता खो देती है जो कि मृदा प्रदूषण का मुख्य कारण है। वैज्ञानिको ने ये दावा किया है कि मट्टी में अब पहले जैसा उपजाऊपन नहीं रहा और यह देश में अनाज की कमी जैसी समस्या को बढ़ावा दे सकता है। वातावरण में प्रदूषण के कारण अम्लीय वर्षा से भी मृदा को हानि पहुँचती है जिसके कारण जमीन अपनी गुणवत्ता खो देती है तथा यह भूमि प्रदूषण को बढ़ावा देने में अधिक सहायक पाई गई है। ज़मीन प्रदूषण के कारण कैंसर, बुखार, त्वचा रोग जैसी बीमारियाँ बढ़ती जा रही हैं। माटी को स्वच्छ बनाने के लिए तथा मिट्टी प्रदूषण पर रोक-थाम के लिए किसानों द्वारा कीटनाशक तथा रसायन वाले खाद के प्रयोग पर रोक लगाना और उसकी जगह जैविक (प्राकृतिक) खाद का प्रयोग किया जाना, पॉली बैग की जगह कपड़े से बने थैले का प्रयोग करना, प्लास्टिक का प्रयोग कम से कम किया जाए, कागज़ के अधिक प्रयोग से बचना तथा पेड़-पौधों की कटाई पर रोक लगाना, कूड़ा-कचरा खुले में न फैलाकर गिले और सूखे दो अलग-अलग डिब्बों में डालना; साफ-सफाई को ध्यान में रखते हुए सरकार ने भी जगह-जगह ऐसी व्यवस्था की है। इस प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार ने नई-नई योजनाएँ निकाली और उस पर कार्य भी किया लेकिन भूमि प्रदूषण को समाप्त करने के लिए प्रत्येक मानव को प्रयास करना होगा तभी इस समस्या का समाधान संभव हो सकता है।

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प्लास्टिक प्रदूषण

आधुनिक युग में प्लास्टिक का पयोग बढ़ गया है, सजावट से लेकर बर्तन, मेज-कुर्सी, विभिन्न प्रकार के मशीन भी अब प्लास्टिक के बनाए जा रहे हैं। प्लास्टिक को किसी भी प्रकार से पूर्ण रूप से नष्ट नहीं किया जा सकता इस वजह से प्लास्टिक की अधिकता ही प्लास्टिक प्रदूषण के नाम से पनपी है जो कि विश्व स्तर पर खरते तथा चिंता का विषय बनी हुई है। आधुनिक युग में प्लास्टिक का प्रयोग बढ़ते जा रहा है; जैसे:- प्लास्टिक के थैलों, डिब्बों, बाल्टी आदि का प्रयोग। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्लास्टिक का इस्तेमाल करना आसान है लेकिन यह भी सच है कि जितनी सहजता से प्लास्टिक से बनी वस्तुओं का प्रयोग किया जाता है उससे दो गुना उसके दुषपरिणाम भी हैं। प्लास्टिक प्रदूषण जलने के बाद भी नष्ट नहीं होता बल्कि हवा को प्रदूषित करता है। कभी-कभी नदी तथा समुद्र में रहने वाले जीव-जंतु जल के साथ-साथ प्लास्टिक को भोजन समझ निगल लेते जिससे उनकी मृत्यु हो जाती है या अनेक प्रकार के बीमारी के शिकार भी होने लगते है जिसके कारण जल प्रदूषण भी बढ़ता हैं। प्लास्टिक में ज़हरीला रसायन होता है; ज़मीन पर इसकी अधिक उपस्थिति भूमि की गुणवत्ता कम कर उसकी उर्वरता को कम कर देता है। प्लास्टिक के अत्यधिक प्रयोग से मनुष्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पढ़ता है। प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने के लिए लोगों को प्लास्टिक की बोलत के स्थान पर स्टील या लोहे के बोतल का इस्तेमाल करना चाहिए साथ ही प्लास्टिक के सामानों का कम से कम प्रयोग करना, खाना बाहर से लाने के स्थान पर घर में ही बनाना, जागरूकता फैलाकर, एन जी ओ (गैस-सरकारी संस्था) के साथ जुड़ कर वस्तुओं के पुनःप्रयोग पर बल देना, छोटे-छोटे प्लास्टिक के पैकेट को न खरीदकर थोक में सामान खरीदना आदि को अपनाकर तथा साथ ही कुछ सहयोग सरकार द्वारा भी किए जाने चाहिर तभी इस समस्या का समाधान संभव होगा।

प्रकाश प्रदूषण

आज की चमक-धमक की दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति अपने चारों ओर रोशनी ही रोशनी चाहता है, यह चाहत इतनी बढ़ चुकी है कि इसने प्रकाश प्रदूषण का रूप धारण कर लिया है। यह मानव द्वारा बनाई जाने वाली प्रकाश व्यवस्था का अत्यधिक गलत उपयोग के कारण उतपन्न हुआ है तथा एक चिंता का विषय बनते जा रहा है। मानव द्वारा निर्मित प्रकाश के अत्यधिक प्रयोग के कारण पेड़ -पौधों को प्राकृतिक प्रकाश नहीं मिल पाता और वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाते हैं इसी प्रकार मनुष्य को भी प्राकृतिक रौशनी मिलने में बाधा उत्पन्न होती है जिसके कारण मनुष्य नए-नए रोगों का शिकार बनते जा रहे है। प्रकाश प्रदूषण छोटे-बड़े जीव-जंतु तथा मानव के आँखों को प्रभावित करता है और उनकी रेटिना पर हानिकारक प्रभाव डालता है, साथ ही यह नदी और समुद्र में रहने वाले प्राणियों के लिए भी खतरे का कारण बनता है। इस प्रदूषण के कारण कीड़े-मकोड़ों की कुछ प्रजातियाँ लुप्त हो चुकी है और कुछ लुप्त होने की कगार पर है। मानव निर्मित प्रकाश सूर्य के प्रकाश से होने वाले सभी कामों में बाधक सिद्ध होता हैं। प्रकाश प्रदूषण को रोकने के लिए मानव द्वारा निर्मित प्रकाश के प्रयोग को कम कर उसके स्थान पर सूर्य के प्रकाश को अधिक उपयोग में लाना जिससे बिजली की भी बचत होगी। वैज्ञानिकों की सलाह से बल्ब का प्रयोग करना, प्रकाश के लिए मापदंड तैयार करना जिसके दायरे में रहकर प्रकाश का उचित प्रयोग किया जा सकता है। प्रकाश के अत्यधिक प्रयोग पर रोक-थाम करके तथा सरकार द्वारा विश्व स्तर पर जागरूकता फैलाकर भी प्रकाश प्रदूषण को कम किया जा सकता है।

रेडियोधर्मी प्रदूषण (रेडियोएक्टिव प्रदूषण / नाभिकीय प्रदूषण)

आधुनिक युग में वैज्ञानिकों ने परमाणु बम की खोज की इस खोज ने विभिन्न देशों को जितना शक्तिसम्पन्न बनाया उससे अधिक इसके नकारात्म प्रभाब भी दिखाए। युद्ध में कोई भी पक्ष जीते लेकिन नुकसान दोनों पक्षों को भरना पड़ता हैं क्योंकि युद्ध से किसी का भला नहीं हुआ है। रेडियोएक्टिव प्रदूषण का प्रभाव आस-पास के सभी क्षेत्रों पर पड़ता है साथ ही इसका प्रभाव सामान्य न होकर अत्यधिक विध्वंसकारी होता है; जिसका समय काल भी अधिक लम्बा होता है।

इसका प्रभाव सभी जीव-जंतुओं पर पड़ता है, सबसे ज़्यादा इससे बुढ़े और शिशु प्रभावित होते है। नाभिकीय प्रदूषण का प्रभाब इतना भयानक होता है कि माँ के गर्भ से जन्म लेने वाला बच्चा विकलांग, कैंसर युक्त या किसी अन्य भयानक रोग से पीड़ित होता हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण सन् 1945 में हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका द्वारा गिराया गया परमाणु बम है; जिसका घातक प्रभाव आज भी लोगों का दिल दहला देता है। रेडियोधर्मी प्रदूषण रेडियोधर्मिता के अत्यधिक प्रयोग से होता है; जैसे:- विद्युत उत्पादन के लिए परमाणु ऊर्जा का प्रयोग, परमाणु ईंधन का प्रयोग, परमाणु बम को बनाने के लिए सबसे अधिक रेडियोधर्मिता का प्रयोग होता है और वैज्ञानिकों द्वारा यह सबसे अधिक नाभिकीय प्रदूषण को बढ़ाने वाला कारण माना गया है, एक्स-रे और रेडिएशन थेरेपी के अत्यधिक प्रयोग से एक ज़हरीला रेडिएशन प्राप्त होता है जिससे आस-पास के लोगों पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता हैं। वैज्ञानिकों ने नाभिकीय प्रभाव को सन् 1990 में पहली बार देखा; जिसमें यह भी दावा किया कि इसके नकारात्मक प्रभाब अत्यंत विनाशकारी होंगे और यह दावा सही सिद्ध होते प्रतीत हो रहा है क्योंकि अब प्रत्येक मनुष्य धीरे-धीरे कैंसर, ट्यूमर, बाल झड़ना, त्वचा रोग जैसी गम्भीर बीमारियों का शिकार हो रहा है साथ ही पेड़-पौधे सूख रहे है तथा पशु-पक्षियों पर भी विकिरण का हानिकारक प्रभाव पड़ रहा है और धीरे-धीरे इनकी प्रजातियाँ भी विलुप्त होती जा रही है। देश ही नहीं अपितु विश्व के लिए भी यह प्रदूषण गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। इसके नकारात्म प्रभाब पर नियंत्रण करने के लिए कुछ कार्य करने होंगे; जैसे:- रेडियोधर्मी हानिकारक पदार्थों का रिसाव बहुत कम विकिरण के साथ ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहाँ प्रकृति को कम से कम नुकसान हो, उद्योगों तथा प्रयोगशालाओं में नाभिकीय सामाग्री के प्रयोग पर सरकार द्वारा पाबंदी, सरकार को ध्यान देना होगा कि भविष्य में परमाणु बम का प्रयोग कोई भी देश न करे, परमाणु ऊर्जा और परमाणु ईंधन के प्रयोग पर रोक-थाम करना इसके अलावा बड़ी-बड़ी संस्थानों को सरकार के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से मिलकर नाभिकीय प्रदूषण को समाप्त करने में सहयोग करना होगा इससे इस गंभीर समस्या का समाधान ढूँढ़ने में आसानी होगी।

औद्योगिक प्रदूषण

आधुनिक युग को औद्योगीकरण का पर्याय माना जाता है। सन् 1947 को देश आज़ाद हुआ इसी के साथ देश में पंचवर्षीय योजना तैयार की गई द्वितीय पंचवर्षीय योजना ने औद्योगिक क्रांति को बढ़ावा दिया और देखते-देखते उद्योगों की स्थापना और उससे निकलने वाला हानिकारक कचरा इतना बढ़ गया कि इसने औद्योगिक प्रदूषण का रूप ले लिया। उद्योगों से निकलने वाला रासायनिक गैस, विषैला जल, कभी न नष्ट होने वाला कचरा, मशीनों का शोर, चिमनियों से निकलने वाला विषैला धुँआ, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन का अधिक प्रयोग ने वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, जल प्रदूषण आदि को बढ़ावा दिया है।प्लास्टिक, स्टील और तेल रिफाइनरी उद्योगों से सबसे अधिक विषैले पदार्थों का उत्सर्जन होता है जिससे विभिन्न प्रकार के रोग फैलते हैं; जैसे:- त्वचा रोग, पीठ दर्द, सर दर्द, बहरापन, मरकरी पॉइजनिंग, कैंसर आदि इन भयंकर रोगों से सबसे ज़्यादा उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारी और आस-पास रहने वाले लोग प्रभावित होते हैं इसके साथ-साथ वहाँ के पशु-पक्षी भी पीड़ित होते हैं तथा उद्योगों के आस-पास नज़र नहीं आते; ये या तो कही दूर चले जाते हैं या वही विलुप्त हो जाते हैं। औद्योगिक प्रदूषण को कम करने के लिए चिमनियों में ऐसी व्यवस्था हो कि उससे निकलने वाला प्रदूषित धुआँ फिल्टर किया जा सके, अधिक से अधिक ऐसे पेड़-पौधों का रोपण करना जो उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक तथा हानिकारक गैसों को अधिक अवशोषित करे और वातावरण को प्रदूषित होने से रोक सके और उद्योगों की स्थापना कृषि क्षेत्र तथा पेड़-पौधों को समाप्त करके न हो, बैग फिल्टर का अधिक उपयोग करना, नदियों में जाने वाले उद्योगों के गंदे पानी पर रोक लगाना, उद्योगों की स्थिति की जानकारी वहाँ काम कर रहे सभी कर्मचारियों को हो तथा स्वास्थ्य जागरूकता की बैठक की व्यवस्था भी हो साथ ही सरकार को भी अत्यधिक प्रदूषण करने वाले उद्योगों पर पाबंदी लगाना चाहिए तभी इस गंभीर चिंता को कम किया जा सकता है।

थर्मल प्रदूषण (तापीय प्रदूषण / ताप प्रदूषण)

थर्मल प्रदूषण का जुड़ाव ताप के कारण होने वाले हानिकारक प्रभाब से है या किसी भी प्रकार से जल के प्राकृतिक तापमान में परिवर्तन कर उसे उसकी वास्तविक गुणवत्ता से दूर करने से है। उद्योगों में जल का प्रयोग शीतलक के रूप में किया जाना और जब यह पानी वातावरण में पुनः आता है तो इसका तापमान अधिक होता है जो कि पर्यावरण के प्रत्येक जीव के लिए नुकसानदायक है क्योंकि इससे ऑक्सीजन में कमी होती है और पारिस्थितिक तंत्र भी प्रभावित होता है। गर्म पानी को नदियों में बहाया जाता है और तापमान सहन न करने के कारण धीरे-धीरे मछलियाँ मरने लगती हैं एवं उनके चयापचय में वृद्धि होती है , उनके अंडे नष्ट हो जाते हैं तथा जलीय पेड़-पौधों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है और शैवाल में वृद्धि के कारण ऑक्सीजन में कमी होने लगती है। तालाबों या जलाशयों द्वारा नदी में अत्यधिक ठंडे जल के बहाव से भी मछलियों, जलीय पौधों, मेरुदंडविहिन जीवाणुओं को हानि पहुँचती है तथा कुछ प्रजातियाँ अपने भोजन में परिवर्तन कर लेती है जिसके कारण उनकी जनसंख्या पर बुरा प्रभाव पड़ता है या विलुप्त होने लगती है। ऑस्ट्रेलिया के नदियों में अचानक किए गए तापमान में परिवर्तन के कारण मछलियों की अनेक प्रजातियाँ समाप्त हो चुकी है और भारत में भी मछलियों की यही स्थिति दिख रही है। थर्मल प्रदूषण को कम करने के लिए जलाशय तथा तलाब के अत्यधिक गर्म जल को तथा तकनीकी प्रयोग द्वारा गर्म जल को संवहन और विकिर्णन द्वारा ठंडा कर सकते है और वातावरण की सहायता से तापमान कम होने पर ही नदी में जल को बहाया जा सकता है। किसी भी जलाशय के जल के तापमान को कम करने के लिए दूसरे जलाशय का निर्माण किया जा सकता है। अत्यधिक ठंडे जल को भी वातावरण की सहायता से प्रकृति के अनुकूल किया जा सकता है और इस प्रकार से थर्मल प्रदूषण को कम करने में सहयोग हो सकता है। उद्योगों को तापीय प्रदूषण के रोक-थाम पर ज़्यादा ध्यान देना होगा तथा सरकार एन जी ओ के साथ मिलकर ऐसे सभी उद्योगों को जागरूक कर सकती है जो उद्योग तापीय प्रदूषण का कारण बन रहे हैं।

दृश्य प्रदूषण

माना कि परिवर्तन प्रकृति का नियम है लेकिन मानव द्वारा प्रकृति के विरुद्ध जाकर उसमें किए गए परिवर्तन का प्रभाब नकारात्म होता है या मानव द्वारा प्रकृति के किसी भी दृश्य में परिवर्तन करना जिसका प्रभाव मनुष्य के मस्तिष्क, स्वास्थ्य और आँखों पर पड़ता हैं दृश्य प्रदूषण कहलाता है। मानव द्वारा अपनी अधिक सुख-सुविधा के लिए पेड़ पौधों को काटना, बड़ी-बड़ी इमारत बनाना, जगह-जगह बिजली के खंभे लगाना, टावर बनाना, सड़क पर कचरा डालना, दिन प्रतिदिन मनुष्य द्वारा वाहन के डिजाइन में परिवर्तन, नदी-नालों में प्लास्टिक वाला कचरा डालना आदि दृश्य प्रदूषण के मुख्य कारण हैं साथ ही सरकार की अनदेखी में व्यापारियों द्वारा खाली जगह का प्रयोग उद्योग बनाने या अपने लाभ के लिए बहुमंजिला इमारत बनाने के लिए करना भी दृश्य प्रदूषण का एक बड़ा कारण है; जिसका नकारात्मक परिणाम मानव दृष्टि पर पड़ता है और प्रकृति में ऐसे अचानक परिवर्तन को देख मनुष्य अवसाद का शिकार भी हो सकते हैं तथा अनेक जिव-जंतु ऐसे मानसिक रोग की चपेट में आने लगते है जिसका इलाज सम्भव नहीं हो पाता। दृश्य प्रदूषण अब चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि प्रकृति का जो सुंदर रूप घरों के आस-पास देखने और सुनने को मिलता था; जैसे हरे-भरे पेड़-पौधें, चिड़ियों की चहचहाहट, तितलियों तथा भौरों के स्वर आदि अब वह महज़ इंटरनेट पर चित्र तथा आवाज़ मात्र के रूप में मिलता हैं।

दृश्य प्रदूषण पर रोक थाम के लिए या इसके प्रभाव को कम करने के लिए मानव द्वारा प्रकृति के साथ किसी भी प्रकार के किए जाने वाले छेड़-छाड़ पर रोक लगाना, सार्वजनिक वाहन का प्रयोग साथ ही सरकार द्वारा खाली पड़े जंगल को व्यापारियों से सुरक्षति रखा जाना, दिन प्रतिदिन बनने वाले बहुमंजिला इमारतों के निर्माण पर प्रतिबंध लगाना, जगह-जगह पेड़-पौधों को लगाने में सहयोग, सुंदर पशु-पक्षियों को घर के पिंजरे मुक्त कर जंगल में छोड़ आना आदि छोटे-छोटे प्रयास से तथा एक-दुसरे के सहयोग से ही दृश्य प्रदूषण के नकारात्मक परिणाम तथा प्रभाव को कम किया जा सकता हैं।

कचरा प्रदूषण

किसी भी वस्तु के उपयोग के बाद प्रयोग में न आने लायक जो भी पदार्थ बचता है या घर में साफ सफाई के बाद प्रयोग में न आने वाली टूटी-फूटी जो भी वस्तुएँ निकलती हैं जिन्हें लापरवाही से इधर-उधर फेंक दिया जाता हैं; उसे कचरा कहा जाता है। जिससे वातावरण में अनेको बीमारियाँ फैलती हैं और इससे आस-पास के प्रत्येक घर के लोग पीड़ित होते हैं। मानव ऐसा दुष्परिणाम का शिकार प्रत्येक दिन रसोईघर का कचरा इधर-उधर फेंकने के कारण भी हो सकता है। जगह-जगह सरकार द्वारा कूड़ेदान की व्यवस्था की गई है लेकिन अशिक्षित लोगों के साथ-साथ शिक्षित लोग भी भेड़ चल चलने लगते है और कचरा सड़क, गली, नालों तथा ट्रेन से नदियों में डालने लगते हैं जो कि स्वयं उनके लिए ही नहीं अपितु पूरे विश्व के लिए खतरा बन गया है। प्रकृति ने हमेशा निःस्वार्थ होकर मनुष्य को सुंदर और स्वच्छ वातावरण प्रदान किया है लेकिन मनुष्य अपने स्वार्थ को आगे रखकर प्रकृति को लगातार नुकसान पहुँचा रहे हैं; वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी के साथ-साथ मनुष्य के विचारों में भी कचरे के समान गंदगी दिखेगी। कचरे को कूड़ेदान में न डालने से वातावरण में छोटे-छोटे बेक्टीरिया फैलते है जिसके कारण डायरिया तथा खसरा जैसी बीमारी फैलती हैं, कभी-कभी लोग कचरा इक्कठा कर उसे जला देते है जिसके कारण हानिकारक गैस; जैसे:- कार्बन-डाय-ऑक्साइड, सल्फर, मोनो-ऑक्साइड तथा मिथेन आदि गैसें निकलती हैं जो प्रकृति को नुकसान पहुँचाते है और साथ ही इससे कैंसर, दमा, त्वचा रोग, टी.बी जैसी बीमारियाँ भी होती हैं। नियमित रूप से कचरा कूड़ेदान में न डालने से खुले में कचरा तथा पानी गिराने से उस जगह गंभीर बीमारी वाले मच्छर पनपने लगते हैं जो मलेरिया तथा डेंगू जैसी बीमारी को फैलाते है।

जले हुए कूड़े से विभिन्न तरह की एलर्जी भी फैलती हैं। कचरा प्रदूषण विश्व के लिए चिंता का विषय बना हुआ है इससे निदान के लिए कुछ कार्य करने होंगे; जैसे:- सबसे पहले कूड़ा कूड़ेदान में डाला जाए, प्लास्टिक का कम से कम प्रयोग किया जाए, कचरा सड़क या इधर-उधर न डालकर कूड़े की गाड़ी में ही डालें, कभी भी कचरे को न जलाए इससे वातावरण को बहुत नुकसान पहुँचता है और ओज़ोन परत का ह्रास भी, सरकार द्वारा कचरा सही जगह न डालने वालो के लिए नियम बनाया जाए और प्रत्येक नागरिक नियम का पालन करें तभी इस चिंता से राहत पाया जा सकती है और कचरा प्रदूषण से विश्व को मुक्त किया जा सकता है।

वाहन प्रदूषण (परिवहन प्रदूषण)

इस युग के भाग-दौड़ की ज़िन्दगी में परिवहन प्रत्येक व्यक्ति की ज़रूरत बन गया है और जब ज़रूरत दिखावा तथा लालच का रूप धारण कर लेती है तब इसके कारण अनेक प्रकार का नुकसान मनुष्य के साथ-साथ विश्व को भी भुगतना पड़ता हैं। आज-कल ज़्यादातर मनुष्य अपने घर के आगे कार खड़ी करने की चाहत रखते हैं तथा जिन अधिकतर लोगों के पास स्कूटर, मोटरसाइकिल है; वह कार ख़रीदने की जिद्दोजहद में लगे रहते हैं। वाहन मनुष्य को दूरी तय करने में सुविधा प्रदान करते हैं तो दूसरी ओर वातावरण को हानि भी पहुँचाते हैं और वाहनों का प्रदूषण सबसे अधिक वायु प्रदूषण को बढ़ाता है। अब गाँव धीरे-धीरे शहरीकरण की तरफ बढ़ रहे हैं जिसके कारण वाहनों का प्रदूषण तेज़ी से बढ़ रहा है क्योंकि वाहनों से निकलने वाले कार्बन-डाइ-ऑक्साइड, हाइड्रो-कार्बन , कार्बन-मोनो-ऑक्साइड, नाइट्रोजन-ऑक्साइड आदि हानिकारक गैसों में वृद्धि हो रही है जिसके कारण ओज़ोन परत का अधिक ह्रास होने लगा है, वायु की की गुणवत्ता समाप्त होने लगी है, जीव-जन्तुओं के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे है; जैसे:- सिरदर्द, फेफड़े खराब होना, दमा, कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित पाए जाते हैं, मौसम पर बुरा प्रभाब पड़ने के कारण धुँध तथा अम्लीय वर्षा में वृद्धि होने लगी है। वैज्ञानिकों की खोज के अनुसार पेट्रोल, डीजल से चलने वाले वाहन वायु प्रदूषण का एक-तिहाई हिस्सा होते हैं। भारत देश 124 मिलियन से भी अधिक लोगों का देश हैं और मोटर वाहनों का सबसे बड़ा उपभोक्ता भी इससे स्पष्ट है कि अगर परिवहन की माँग पर रोक न लगा तो इसके कारण देश को भविष्य में जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है। सरकार ने 2022 से बीएस-6 मानकों पर आधारित वाहनों का प्रयोग शुरू करने की घोषड़ा की थी लेकिन वाहन प्रदूषण को तेज़ी से बढ़ते देख इसे 2020 में ही प्रयोग में लाने का फैसला सरकत को करना पड़ा।

परिवहन प्रदूषण पर रोक के लिए सरकार द्वारा कुछ सख़्त नीतियों का निर्धारण करना होगा और साथ ही अधिक से अधिक सार्वजनिक वाहनों का प्रयोग करना अगर घर में कार है और परिवार या पड़ोस के चार सदस्य एक ही रास्ते जा रहे हैं तो ऐसी स्थिति में एक ही वाहन का प्रयोग करना, भीड़ वाले इलाकों (विद्यालय, महाविद्यालय, गाँव, शहर उद्योग) में जागरूकता अभियान करना, ट्रैफिक नियमों का पालन करना, और अधिक से अधिक वाहनों की ख़रीद से बचना आदि। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के सहयोग से वाहन प्रदूषण को कम किया जा सकता है क्योंकि प्रकृति किसी के साथ कोई भेद-भाव नहीं करती इसलिए पृथ्वी की सुरक्षा व्यक्तिगत ज़िम्मेदारी है जिसे प्रत्येक मनुष्य को समझनी तथा निभानी चाहिए।

रासायनिक प्रदूषण

वैज्ञानिकों का कहना हैं कि कार्बनिक या अकार्बनिक वस्तुएँ सूर्य के प्रकाश के साथ क्रिया करके जहरीली गैसें वायु में मिलकर रासायनिक प्रदूषण के रूप सामने आती है। उद्योगों से निकलने वाला धुआँ, कूड़ा-कचरा से निकलने वाला तरल पदार्थ, प्लास्टिक को जलाना, घर के आस-पास खुली नालियाँ, समुद्र में जीव-जंतुओं के शव का सड़ना, कृषि में रासायनिक खाद जैसे:- कार्बनिक क्लोरीन, कार्बनिक फास्फोरस यौगिक का प्रयोग आदि से निकलने वाले गैस या पदार्थ रासायनिक प्रदूषण के मुख्य कारण हैं। इनसे निकलने वाला गैस जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, मनुष्य के साथ-साथ पूरी पृथ्वी के लिए नुकसानदायक हैं।

आधुनिकता के होड़ में विदेशों से लेकर भारत तक उद्योगों से सबसे अधिक हानिकारक गैस निकलते हैं जो रासायनिक प्रदूषण को अधिक बढ़ाते है जिससे वायु अधिक प्रदूषित होता है। अधिक पैदावार के लिए किसान कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग करते है जिसके कारण किसानों का स्वास्थ्य बिगड़ता है साथ ही जब उन पेड़-पौधों का सेवन पशु-पक्षी करते है तो उनके जान को ख़तरा होता है और ऐसे फसलों से प्राप्त फल-सब्जियों का सेवन करने से मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है एवं अनेक बीमारियों को झेलना पड़ता हैं। भोपाल की रासायनिक गैस जैसी दुर्घटनाएँ किसी भी प्राणी के प्रति दया नहीं दिखाती कभी-कभी ऐसी दुर्घटनाएँ मनुष्य की छोटी-सी लापरवाही या गलती की वजह से भी हो सकती है। ऐसी घटनाओं के कारण होने वाला नुकसान वायु की गति या बहाव पर निर्भर करता है। प्रथम विश्व युद्ध में जर्मन ने जहरीले गैस मिथेन का प्रयोग कर अपने दुश्मनों पर हमला किया लेकिन इसके प्रभाव का भयंकर रूप देखने को मिला। रासायनिक प्रदूषण के कारण एग्जीमा, त्वचा रोग, मुहाँसे, कैंसर, अस्थमा आदि भयंकर बीमारियों से मनुष्य पीड़ित होते जा रहे हैं साथ ही उनके फेफड़ों और मस्तिष्क पर भी हानिकारक प्रभाव पड़ता है। रासायनिक प्रदूषण विश्व के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। इसके प्रभाव को कम करने के लिए उद्योगों से निकलने वाले रासायनिक गैसों पर रोक लगाना होगा, युद्ध में हानिकारक गैस का प्रयोग न हो इसका ध्यान सरकार को रखना होगा, घर के आस-पास के नालों को ढकना, कूड़ेदान की साफ-सफाई रखना, कृषि में रासायनिक खाद के स्थान पर जैविक खाद का प्रयोग करना आदि प्रयास करना; तभी मानव स्वस्थ वायु में साँस ले पाएंगे।

पर्यावरण और वन-विनाश

मनुष्य के आस-पास प्रकृति की जितनी भी रचनाएँ है वह सब पर्यावरण का निर्माण करती है। आधुनिक युग में विकास के नाम पर पर्यावरण को अधिक हानि हो रहा है जिसका नुकसान विश्व का प्रत्येक नागरिक भुगत रहा हैं। वनों की कटाई, प्रदूषित हवा, मिट्टी की गुणवत्ता समाप्त, लगातार प्राकृतिक आपदा में वृद्धि अदि पर्यावरण प्रदूषण से जुड़ीं समस्याएँ हैं। इतिहास के पन्नों को खोलकर देखा जाए तो साफ होता हैं कि यह समस्याएँ पहले नहीं थी अगर थी भी तो बहुत कम और प्रकृति पुनः उसका निराकरण करती थी और मनुष्य भी पर्यावरण की सुरक्षा करने के लिए सदैव सचेत रहते थे लेकिन धीरे-धीरे औद्योगिकीकरण और सुख-सुविधा के अधिक लालच के कारण पर्यावरण के प्रति जागरुकता तथा सावधानी कम होती गयी तथा आज भी यह समस्याएँ बनी हुई हैं। इस विध्वंसकारी समस्या पर सरकार का ध्यान सन् 1972 में स्वीडन के स्टॉकहोम में हुए प्रथम संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण महासम्मेलन के कारण आकृष्ट हुआ। भारत के नागरिक पेड़-पौधों मुख्यतः पीपल, नीम, तुलसी आदि की पूजा प्राचीन काल से ही करते आ रहे हैं जिससे यह सत्यापित होता है कि संस्कृति भी पेड़-पौधों के महत्त्व को स्वीकार करती है तथा मत्स्यपुराण में एक पुत्र को दस तलाबों के बराबर और एक वृक्ष को दस पुत्रों के बराबर बताया गया है। 19.5 प्रतिशत ही भारत में वन है, लगातार पेड़-पौधों की कटाई के कारण यह प्रतिशत और भी कम होता जा रहा है लेकिन वैज्ञानिकों द्वारा देश में कम से कम 33 प्रतिशत वन का होना आवश्यक माना गया है ।

उद्योगों की स्थापना के लिए वनों की समाप्ति, जनसंख्या एवं शहरीकरण में वृद्धि, वनों में आग लगना, सैलानियों का बढ़ता दबाव, प्राकृतिक आपदाओं ( भूकंप, सुनामी, तेज़ आँधी) में वृद्धि आदि वन विनाश के कारण हैं। वनों के लगातार विनाश से मानव तथा जीव-जन्तुओं को खतरा, मृदा अपरदन में वृद्धि, अम्लीय वर्षा, ओज़ोन परत का ह्रास, उपजाऊ भूमि में कमी, ऑक्सीजन में कमी तथा कार्बन-डाइ-ऑक्साइड में वृद्धि, स्वच्छ जल की कमी औरन पेड़-पौधों की प्रजातियों की समाप्ति भी होती जा रही है ये सब वन विनाश के भयानक परिणाम हैं। इन परिणामों के प्रभाव को कम करने के लिए वनों की कटाई पर रोक लगाना होगा और साथ ही प्राकृतिक संरक्षण को बढ़ावा देना, वनों की उत्पादकता को बढ़ाना, वन के स्थान पर वैकल्पिक उत्पादों का प्रयोग करना, प्रकृति के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना आदि छोटे -छोटे प्रयासों को जीवन में अपनाना होगा तभी वन विनाश के कारण विध्वंसकारी परिणाम को कम किया जा सकता है।

शहरी जीवन में बढ़ता प्रदूषण

आज शहरों का विकास जितनी तेज़ी से हो रहा है उससे अधिक तेज़ी से वहाँ प्रदूषण भी बढ़ता जा रहा है। शहरों में विकास के नाम पर प्रदूषण का हानिकारक प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है। दिल्ली, मुम्बई, चैन्नई और कोलकाता जैसे भीड़ वाले शहरों में प्रदूषण अधिक बढ़ रहा है क्योंकि यहाँ जनसंख्या तथा महँगाई इतनी अधिक है कि लोग सड़कों पर रहने को विवश है और वाहनों से निकलने वाले रासायनिक गैसों के चपेट में आकर गंभीर बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। शहरों में पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली वस्तुओं की संख्याएँ बढ़ती जा रही जिसके कारण वायु, जल, मिट्टी जैसे प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित हो रहे है तथा उनकी गुणवत्ता समाप्त होती जा रही है। मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए प्रकृति के संसाधनों का अत्यधिक प्रयोग करने लगे है; जैसे:- पेड़-पौधों की कटाई, वनों की सफाई कर उद्योगों का निर्माण, एक से अधिक वाहनों की खरीद में बढ़ावा, उपज में वृद्धि के लिए रासायनिक खाद का प्रयोग आदि। नदी-नालों में प्लास्टिक तथा कूड़ा कचरा फैंकने से प्रदूषण ने अपना विकराल रूप धारण कर लिया है इस प्रकार शहरों में बढ़ता प्रदूषण नई-नई बीमारियों को बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता है अभी कोरोना एक ऐसी बीमारी के सामने आई है जो विश्व स्तर पर फैली हुई है, जो मनुष्य को पर्यावरण की स्वच्छ्ता के महत्त्व को समझा रहा है। अब प्रत्येक मनुष्य सड़क पर मास्क में नज़र आता है। शहरी जीवन में बढ़ते प्रदूषण को कम करने लिए कूड़ा कूड़ेदान में डालना, पेड़-पौधों को न काटना, उद्योगों के लिए नियम निर्धारित करना, वृक्षारोपण को बढ़ावा देना, बड़ी-बड़ी इमारतों के निर्माण पर रोक लगाना, जनसंख्या पर नियंत्रण करके मनुष्य सहयोग कर सकते हैं तभी शहरों में लगातार तेज़ी से बढ़ रहे प्रदूषण को रोका जा सकता है।

यमुना प्रदूषण एक गंभीर समस्या क्यों

यमुना नदी का पानी इतना गंदा हो चूका है कि उसे यमुना नाला कहा जाने लगा है। यह नदी दिल्ली से उत्तर-प्रदेश तक फैली हुई है जो सबसे अधिक प्रदूषित हो चुकी है। इस नदी के पानी का प्रयोग सिंचाई हेतु हरियाणा एवं उत्तर-प्रदेश में निर्गमन, कृषि गतिविधियों के कारण नदी में सूक्ष्म प्रदूषकों का प्रवाह, दिल्ली के लोगों द्वारा घरेलू तथा औद्योगिक कचरे को नदी में फैंकना आदि कारणों से यमुना अब नाले के रूप में नज़र आती है। जल के प्रदूषण के कारण आस-पास के लोग डायरिया, आँतों के कृमि, हेपेटाइटिस जैसी बीमारियों से पीड़ित रहते है। यमुना नदी की दशा दल्ली के वजीराबाद से निकलने के देखने लायक नहीं होती इसका कारण नदी में दिल्ली के ज़्यादातर उद्योगों का विषैला पानी गिराया जाना, इसके किनारे बसे लोगों द्वारा मल-मूत्र को यहाँ बहा दिया जाना, धर्म के नाम पर नदी के पास बसे लोगों द्वारा यमुना में मूर्तियाँ तथा घरेलू रासायनिक कचरा विसर्जन करना आदि। यमुना प्रदूषण की गंभीर समस्या को कम करने लिए सरकार तथा गैर-सरकारी संस्थाओं ने सन् 1993 से लेकर अब तक तीन यमुना एक्शन प्लान बनाए तथा उस पर कार्य करने का प्रयास किया लेकिन समस्याएँ जस की तस बनी हुयी हैं। इसे साफ करने के लिए योजनाएँ बनाई गई और उन योजनाओं पर करोड़ो रुपए खर्च किए गए लेकिन इसे व्यवस्था की कमी ही कहा जा सकता है; यमुना आज भी नाले के रूप में देखी जा रही है क्योंकि 2012 में कोर्ट का सरकार से सवाल था कि “अगर यमुना की सफाई पर कार्य किया गया है तो उसके सकारात्म परिणाम क्यों नहीं मिले?” यह सवाल अब भी बना हुआ है। 22 नालों से प्रतिदिन 450 लीटर मलयुक्त गंदा पानी बिना किसी शोध के यमुना नदी में बहाया जा रहा है इसमें दिल्ली की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। यमुना को प्रदूषण मुक्त बनाने की अति आवश्यकता है और इसे सफल बनाने के लिए सरकार तथा दिल्ली वासियों को मिलकर यमुना के साफ-सफाई पर गंभीरता से कार्य करना होगा तभी यमुना का पानी स्वच्छ हो सकता है।

प्रदूषण के कारण

इस वैज्ञानिक युग में मनुष्य को जिनती सुख-सिविधाएँ प्राप्त हुई है उससे अधिक समस्याएँ बढ़ी हैं जिसे पृथ्वी का प्रत्येक नागरिक झेल रहा है। ‘प्रदूषण’ शब्द दो शब्दों के मेल प्र+दूषण से बना हैं जिसका अर्थ ‘पर्यावरण में अवगुणों का या दूषित पदार्थों का मिश्रण है।’

जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, रासायनिक प्रदूषण आदि मुख्य रूप से प्रदूषण के रूप है जिनके प्रभाव अत्यधिक जानलेवा प्रतीत होने लगा है। इसका मुख्य कारण औद्योगीकरण है जब से उद्योगों की स्थापना में लगातार वृद्धि हुई तब से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने लगा है और आज भी यही स्थिति बनी हुई है, बढ़ते प्रदूषण अन्य कारण भी है; जैसे- शहरीकरण में में वृद्धि, परिवहन का अत्यधिक दुरुपयोग, कूड़ा-कचरा कूड़ेदान में न डालकर इधर-उधर डालना, वृक्षों की अंधाधुंध कटाई, पेट्रोल तथा डीजल का अधिक प्रयोग, प्लास्टिक तथा चमड़े के कारखानों से निकलने वाला गंदा-रासायनिक जल नदी में बहा देना, देर रात तक अत्यधिक शोर करना तथा तेज़ आवाज़ में गाने सुनना, इंटरनेट का गलत प्रयोग जिसके कारण लोग मानसिक रोगों के शिकार हो रहे है, अधिक फसल के लिए रासायनिक खाद का प्रयोग करना, कोयले का अत्यधिक प्रयोग, जनसंख्या में वृद्धि आदि साथ ही अब पटाखों के उद्योग भी सामने आ रहे है जहाँ 14 साल से कम उम्र के छोटे-छोटे बच्चे भी पटाखों को हाथ से बनाते हुए पाए जाते हैं जो कि कानूनी अपराध है। पटाखों को बनाने में बारूद का प्रयोग होता है जो हाथों को नुकसान पहुँचाता है और बारूद के छोटे-छोटे कण वायुमंडल में मिलकर पर्यावरण को भी अधिक हानि पहुँचाते है जिससे त्वचा रोग, कैंसर, अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियाँ फैलती हैं।

प्रदूषण को कम करने के उपाय (Pradushan Samasya Aur Samadhan)

प्रकृति की किसी भी जैविक या अजैविक पदार्थ को किसी भी प्रकार से हानि पहुँचाना तथा मनुष्य द्वारा उनमें परिवर्तन करना पर्यावरण प्रदूषण कहलाता है। आधुनिक काल में मनुष्य अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए लगातार प्रकृति के संसाधनों का दोहन कर रहा है और लगाता मनुष्य का स्वार्थ बढ़ते जाना एक गंभीर समस्या बन चुकी है। कार्बन-डाइ-ऑक्साइड, मिथेन, हाइड्रोजन, क्लोरीन, रासायनिक पदार्थ, कूड़ा-कचरा, ध्वनि, ऊष्मा आदि पर्यावरण को प्रदूषित करने वाले मुख्य कारण हैं। लगातार बढ़ता प्रदूषण विश्व के लिए चिंता का विषय बना हुआ है इसके कारण कोरोना जैसी महामारी पूरे विश्व में फैल चुकी है, इस समस्या से समाधान के लिए जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण करना, पेड़ों की कटाई पर रोक लगाना वृक्षारोपण को बढ़ावा देना, रासायनिक खाद पर प्रतिबंध लगाना तथा उसके स्थान पर जैविक खाद का प्रयोग करना, चिमनियों की ऊँचाई को बढ़ाना, उद्योगों में फिल्टर लगाना, कारखानों से निकलने वाले जल को तालाबों में वातावरण के अनुकूल बनाकर नदियों में प्रवाहित करना, शोर करने वाले मशीनों में तेल डालना तथा कम शोर करने वाली मशीनों का प्रयोग करना, परमाणु बमों के परीक्षण पर प्रतिबंध लगाना, सिंगल यूज प्लास्टिक के प्रयोग पर रोक लगाना तथा पुनः प्रयोग के लिए सचेत होना, घरेलू अपशिष्ट को प्रत्येक दिन कूड़ेदान में डालना, पेट्रोल तथा डीजल के स्थान पर सी.एन.जी के इस्तेमाल पर बल देना, सौर्य ऊर्जा का प्रयोग करना, वर्षा जल को एकत्रित कर उसका पुनः प्रयोग करना आदि उपाए को अपनाकर प्रदूषण जैसी विध्वंसकारी समस्या का समाधान किया जा सकता है। वातावरण की सुरक्षा निस्वार्थ भाव से करना, प्रत्येक नागरिक को इसे ज़िम्मेदारी के रूप में समझना चाहिए तभी प्रदूषण को ख़त्म किया जा सकता है क्योंकि मनुष्य को स्वस्थ रहने के लिए पर्यावरण का प्रदूषण मुक्त होना अति आवश्यक है।

निष्कर्ष – प्रदूषण पर निबंध

पर्यावरण की सुरक्षा के लिए सरकार ने 1974 में ही कानून बनाया लेकिन महज़ कागज़ों पर लिख देने से प्रकृति की सुरक्षा नहीं होगी आवश्यक है उन कानूनों पर सख़्ती से कार्य करने की क्योंकि कोरोना जैसी महामारी साफ-साफ दिखा रही है कि अब प्रदूषण ने अपना रूप विकराल कर लिया है अगर प्रदूषण को कम न किया गया तो पृथ्वी पूरी तरह मृत्यु के सामान प्रदूषण का शिकार बन सकती है। इसके हानिकारक प्रभाव को कम करने के लिए सरकार के साथ-साथ प्रत्येक नागरिक को इसे ज़िम्मेदारी के रूप में समझना होगा और प्रकृति को प्रदूषण मुक्त करने के विषय पर साथ मिलकर कार्य करना होगा। देश के विकास को ध्यान में रखते हुए पर्यावरण को सुरक्षित करना होगा तभी वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित तथा उनका स्वास्थ्य स्वस्थ होगा एवं उन्हें स्वच्छ वातावरण प्राप्त हो सकेगा। यह जागरुकता अपने आस-पास के लोगों तक पहुँचाते रहना होगा।

सन्दीप शाह

सन्दीप शाह दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हैं। वे तकनीक के माध्यम से हिंदी के प्रचार-प्रसार को लेकर कार्यरत हैं। बचपन से ही जिज्ञासु प्रकृति के रहे सन्दीप तकनीक के नए आयामों को समझने और उनके व्यावहारिक उपयोग को लेकर सदैव उत्सुक रहते हैं। हिंदीपथ के साथ जुड़कर वे तकनीक के माध्यम से हिंदी की उत्तम सामग्री को लोगों तक पहुँचाने के काम में लगे हुए हैं। संदीप का मानना है कि नए माध्यम ही हमें अपनी विरासत के प्रसार में सहायता पहुँचा सकते हैं।

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