घनश्याम की आँखें

घनश्याम की आँखें जिस आकर्षण को लिए हुए हैं, उसका वर्णन अनेकानेक कवियों ने किया है। स्व. श्री नवल सिंह भदौरिया “नवल” ब्रज भाषा की अपनी इस कविता में उन्हीं आँखों और उनके तीव्र आकर्षण का वर्णन कर रहे हैं। पढ़ें “घनश्याम की आँखें”–

नील सरोवर तें निकसीं विकसी जनु द्वै जलजात की पाँखें।
खंजन, मीन, कुरंग रहे ठगि, देखि जिन्हें मन में अभिलाखें।
मोतिनि सों भरी सीपें लजाति हैं, हेरि के भाव भरी रस फाँखे।
ऊपर मोर की पाँखे हँसैं अरु नीचे हँसे घनस्याम की आँखें।


खंजन ते बिनु अंजन के सुठि लागें जिन्हें लिखिकें नहिं थाकें।
टेढ़ी तिरीछी कटौहीं सी भौंह नचाय करी जिनि खूब मजा कें।
दै परतीति अनीति करी नहिं आये वे बीति गईं दुय पाखें।
काढ़ेउ तें न कढ़ैं उरतें ऐसी टेढ़ी अड़ीं घनस्याम की आँखें।


ताल तमाल ते रंग लियौ अरु चाकि कै कीन्हीं रसाल की फाँकैं।
फेरि सनेह कौ नीर भर्यौ सित मानस के द्वै मोती हू झाँकैं।
कज्जल की मसि लेप करी पुनि ढाँकि दईं जलजात की पाँखें।
गोल कपोल अमोलनि के बिच राजति यों घनस्याम की आँखें।

स्व. श्री नवल सिंह भदौरिया हिंदी खड़ी बोली और ब्रज भाषा के जाने-माने कवि हैं। ब्रज भाषा के आधुनिक रचनाकारों में आपका नाम प्रमुख है। होलीपुरा में प्रवक्ता पद पर कार्य करते हुए उन्होंने गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, सवैया, कहानी, निबंध आदि विभिन्न विधाओं में रचनाकार्य किया और अपने समय के जाने-माने नाटककार भी रहे। उनकी रचनाएँ देश-विदेश की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं। हमारा प्रयास है कि हिंदीपथ के माध्यम से उनकी कालजयी कृतियाँ जन-जन तक पहुँच सकें और सभी उनसे लाभान्वित हों।

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